रुसेन कुमार द्वारा
भारत एक नए दौर से गुजर रहा है। शिक्षा के विस्तार से बुद्धि में तेज आने से सभी लोग तेजी से भागना चाहते हैं। उचित दिशा की तलाश में लोगों को नहीं मालूम कि वे किस दिशा में जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था केंद्रित विकास करने की आकांक्षा के कारण मानवीय मन में भारी मात्रा में भ्रष्ट मानसिकता फैल रही है। इधर दूसरी ओर, एक वस्तु लेने पर दूसरी वस्तु मुफ्त पाने के आकांक्षी भारतीय उपभोक्ता धरती के अंधाधुंध दोहन को बढ़ावा दे रहे हैं और स्वच्छ-सुंदर धरातल को प्लास्किट, पेपर और थर्माकोल से पाट देने में प्रत्यक्ष योगदान दे रहे हैं। धरती का उपजाऊ धरातल दिनों-दिन अप्राकृतिक कचरे से ढंकते जा रहा है।
भारत की समृद्धि के लिए पाँच आयामों का विवरण यहाँ क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत कर रहा हूँ। समृद्धि के पाँच मूलभूत तत्व हैं – धरती, मानव जाति, समाज, राष्ट्र – लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था। प्रगति और समृद्धि के लिए इन पाँच बातों के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता, आप कहीं भी चले जाइए, इन्हीं पाँच बातों में सभी बातें परस्पर जुड़ी हुई मालूम होंगी। हमारी सभी बातें इन्हीं पाँच तत्वों में समाहित रहती हैं और उसी से उत्पन्न होती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं। सभी लोग समृद्धि के आकांक्षी हैं लेकिन समृद्धि के वास्तविक अर्थ को समझने और समझाने की आवश्यकता है। मनुष्य का स्वभाव समृद्धि है, समृद्धि की ओर प्रवृत्त रहना है। समृद्धि चाहना मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है। धरती में उपलब्ध सभी संसाधन मनुष्यों को समृद्ध करने के लिए ही है।
सच कहूँ तो भारत की समृद्धि उसकी कृषि पद्धति से जुड़ी हुई है, और उसमें ही अन्तर्निहित है। कृषि योग्य जमीन ही सभी समृद्धि का आधार है। भारत की विशाल जनसंख्या की बुद्धि को अगर प्रकृति के अनुकूल रहने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया गया तो अगले 100 वर्षों में कचरे के घर में तबदील कर डालेगी। इसमें कोई संदेह नहीं रखना चाहिए कि आज प्रत्येक व्यक्ति अव्वल दर्जे का लोभी हो चुका है और जिस डाली में बैठा है उसी को काट रहा है।
भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भारत को एक विशाल अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित करने की योजना पर गहनता से कार्य कर रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में हममें अधिक समझ विकसित हो इसके लिए अपनी बातों को क्रमबद्ध ढंग से रख रहा हूँ।
धरती

धरती एक ग्रह के रूप में हमारी आकाशगंगा में सबसे समृद्ध है। धरती स्वयं समृद्ध है। धरती की समृद्धि को और अधिक विकसित नहीं किया जा सकता, बल्कि उसे मानवीय हस्तक्षेप से बचाया जाना चाहिए। धरती पर मानवीय हस्तक्षेप कम से कम हो, इसका समुचित प्रबंध होना चाहिए। यहाँ वह सब कुछ है जो किसी भी सर्वश्रेष्ठ ग्रह में जीवन को विकसित होने के लिए आवश्यक होता है। हमें यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि धरती ही सम्पूर्ण संसाधन की स्वामिनी है। धरती सदैव से थी और सदैव रहेगी। धरती को खोदना-खरोचना हमारे लिए कभी भी हितकर नहीं हो सकता। धरती की समृद्धि किस बात में है - धरती की समृद्धि धरती को उसके मूल स्वरूप में रखने में है। धरती का आधार है जल, जो यहाँ प्रचुर मात्रा में वरदान के रूप में उपलब्ध है। सभी प्रकार की वनस्पतियाँ जल से ही उत्पन्न होती हैं। कृषि वास्तविक समृद्धि है। कल-कारखाने साधन हैं। कृषि साधना है। कृषि ज्ञान स्वयं में महान संसाधन है। कृषि पद्धति से जीवन-यापन करने का ज्ञान मनुष्यों का अब तक का सर्वोत्तम ज्ञान है। कृषि के लिए आवश्यक है मिट्टी की उर्वरता, पेड़-पौधे, जीव जंतु और वनस्पतियों की अधिकता। धरती की प्रिय संतानों को अपनी जननी की सेवा ही करनी चाहिए। मनुष्य जाति को यह भली-भांति समझना होगा कि मनुष्यों में धरती को समृद्ध करने की क्षमता ही नहीं है। मनुष्य की प्रत्येक गतिविधि धरती के वातावरण को दूषित करती है, इसलिए उसे सावधान होकर अपने क्रियाकलाप करने चाहिए। यह कटु सत्य है कि मानवीय क्रियाकलापों ने अनेक जीवों और वनस्पतियों को सदैव के लिए नष्ट कर दिया है। धरती का मूल स्वभाव जीवन उत्पन्न करना और उसे पालना है। धरती मनुष्य के जीवित रहने के लिए आवश्यक जरूरतों को पूरा करने के लिए है, न कि उनकी बेतुकी इच्छाओं एवं महत्वकांक्षाओं की आपूर्ति के लिए। धरती में रहने के लिए हम भारतीयों को विवेकपूर्ण व्यवहार करना ही चाहिए।
मनुष्य

मनुष्य धरती की संतान है। वह धरती में जन्म लेता है और धरती में ही विलीन हो जाता है। मनुष्य धरती की कोख में उपजे अन्न का सेवन करके ही पोषित, समृद्ध और तृप्त होता है। मनुष्य धरती का ऋणी है। मनुष्य के जीवन का सम्पूर्ण काम धरती से उधार लेकर चलता है। उसे न तो धरती के विरुद्ध सोचना चाहिए और न ही धरती के अतिरिक्त सोचना चाहिए। संतान होने के कारण मनुष्य धरती का सेवक है – स्वामी नहीं। मनुष्य धरती का नित्य दास है। जो भी धरती की हृदय से अधिक सेवा करेगा वह अधिक सुखी, अधिक समृद्ध और अधिक आनंदित रहेगा। धरती की समृद्धि के अतिरिक्त वह जो भी कुछ करेगा, वह निरर्थक और पतनकारी सिद्ध होगा। मनुष्य धरती से लगाव की भावना से जितना अधिक दूर होगा, उसकी बुद्धि उतनी अधिक पतनकारी विचार पैदा करेगी। मनुष्य की सम्पूर्ण बीमारियों की दवा धरती के पास है, कहीं न कहीं संचित की गई है। मेरे दृष्टिकोण में मानवों में धरती माँ के प्रति अनुराग उत्पन्न करना ही शिक्षा का परम उद्देश्य है। मनुष्य जब नहीं था, तब भी धरती का अस्तित्व था। मनुष्य धरती पर किराएदार हैं। मनुष्य का संबंध केवल धरती के धरातल से है, धरती के भीतर की खनिज-संपदा पर उसका किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं है।
यह बात प्रमाणित है और सभी मनीषियों का उद्घोष है कि मनुष्य का मन जितना आधिक हिंसक होता जाएगा, विषैला होता जाएगा, वह उतनी अधिक मात्रा में प्रकृति के विरुद्ध व्यवहार करेगा। हमारे किसी व्यवहार से धरती का, अर्थात धरती में रहने वाले जीवों का अकल्याण हो जाए, इससे बड़ी अधिक विडम्बना और कुछ भी नहीं। मानवीय व्यवहारों से धरती का एक इंच भी इधर से उधर हो जाय तो इससे बड़ी भारी विडम्बना और क्या होगी! मनुष्य का मूल स्वभाव धरती ज्ञानयुक्त सेवक होना है।
समाज
मनुष्य में सभी तरह की बुराई उसके सामाजिक होने के कारण जन्म लेती है। भारत के लोगों ने अपने आप को दो तरह के समाज में रूपान्तरित कर लिया है – भेंड़ों का समाज और कैदियों का समाज। जो भेड़ों के समाज के सदस्य नहीं हैं वे कैदियों के समाज के सदस्य हैं। इकट्ठा होने का नाम समाज नहीं है। भेंडों को एक जगह रख देने से – यह भेंड़ों का सभ्य समाज है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। भारत के किसी केंद्रीय कारागार में अगर हजारों कैदियों को आजीवन रखा गया हो, तो क्या उसे समाज की उपमा दी जा सकती है, कदापि नहीं। केंद्रीय कारागार में सभी कैदी अपने-अपने दुःख से दुःखी हैं, अतः सभी कैदी मिलजुलकर अच्छा कार्य कर भी लेंगे तब भी उनमें बंधन का बोध बना रहेगा।
समाज बनता है आपस में सहयोग करने की भावना से। सामूहिकता में ही सभी समस्याओं का उपाय रहता है। भारतीयों ने इस मूल बात को हजारों वर्ष पूर्व जान लिया था। भारत का सबसे बड़ा पतन है संयुक्त परिवार का बिखरना। संयुक्त परिवार भारत का महान सामाजिक अन्वेषण है। इसे बचाने में न तो किसी की रुचि है और न ही यह कैसे बचे इस ओर किसी का ध्यान है। संयुक्त परिवार में एक घड़े के जल से पूरे घर की प्यास बुझ जाती है। आज सबके पास वाटर प्यूरीफायर भी उसकी प्यास को तृप्त नहीं कर पा रहा है। संयुक्त परिवार की भावना के विखंडन से ही समाज में बुराइयाँ उत्पन्न हो रही हैं। सामाजिक मनुष्य के लिए आत्मकेंद्रित रहने की बढ़ती वृत्ति राष्ट्र की प्रगति के हानिकारक सिद्ध होगी।
मनुष्य अपने परिवार के साथ कैसे रह सके, इसका उपाय नीति निर्धारकों को उपाय सोचना चाहिए। भारत को समृद्ध बनाने के लिए बच्चों और युवाओं को सामाजिक व्यवहार के बारे में गहन अध्ययन करना ही होगा। समाज का विघटन और भौतिक विकास समानांतर होने से केवल धरती का ही नुकसान है।
राष्ट्र – लोकतंत्र

भारतीय होने के नाते से हमारा परम कर्तव्य है कि हम अपने भू-भाग में आने वाले सम्पूर्ण संसाधनों और जीव जंतुओं की रक्षा करें, न की उनका दोहन करें। दोहन करने की मानसिकता उच्च कोटि की भ्रष्ट मानसिकता है। भू-भाग से ही राष्ट्र की पहचान होती है। हमें अपने मानचित्र पर गर्व है पर हमें अपने पहाड़ों पर गर्व नहीं है। राष्ट्र की असली संपदा है उसकी भूमि पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन। भारत जैसे राष्ट्र के लिए उसके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपनी प्राकृतिक संपदा को कैसे बचाए। भारत को एक राष्ट्र के रूप में औद्योगिक प्रगति को संतुलित करना ही होगा। इसमें किसी को संदेह नहीं रखना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट की खुली छूट और कृषि योग्य भूमि का दुरुपयोग, अगली सदी तक भारत को एक खोखले राष्ट्र के रूप में तब्दील कर डालेगा। भारत की सशक्तिकरण का आधार केवल कृषि है और कृषि होती है उपजाऊ जमीनों पर। भारतीयों के लिए कृषि योग्य जमीन ही उसकी अक्षय संपदा है। इस धरती पर ऐसे अनेक देश हैं जहाँ कृषि योग्य जमीन ही नहीं है। अनेक राष्ट्र आज भी समुद्री जीवों पर निर्भर हैं। भारत का सौभाग्य है कि उसकी जमीन पर असंख्य प्रकार के फल, फूल, कंद-मूल, और औषधियाँ अनंत मात्रा में उपलब्ध हैं। गंगा, महानदी जैसी विशाल नदियाँ हैं, जो भारत को सही मायनों में भारत बनाती हैं। भारत को एक राष्ट्र के रूप में सफल होना है तो उसे कृषि की ओर लौटना ही होगा। कृषि में लोगों की भागीदारी बढ़ाना ही सरकारों का मुख्य कार्य होना चाहिए। भारत की जनता कृषि विमुख हो चुकी है, क्योंकि कृषि पर दलालों का कब्जा हो चुका है और उस पर पूंजीपति अपनी कुदृष्टि गड़ाए हुए हैं। कृषि के प्रति ऐसी ही उपेक्षा बनी रही और समय रहते कृषि के प्रति उदार नजरिया न विकसित किया गया तो, कृषि कानून की विडम्बना का परिणाम यह होगा कि अगली सदी तक भारत के मूल निवासी पूंजीपतियों के स्वैच्छिक दास या गुलाम बन जाएंगे। मशीन और उर्वरक आधारित कृषि अर्थव्यवस्था भारत के करोड़ों लोगों को गुलामी की जिंदगी जीने की ओर पहले ही धकेल चुका है। एक राष्ट्र के रूप में मनुष्य की समृद्धि कृषि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। वह इसलिए क्योंकि मनुष्य केवल अन्न खाकर और पानी पीकर ही जीवित रह सकता है।
अर्थतंत्र-अर्थव्यवस्था
हम भारतीयों को यह समझना होगा कि हम आधुनिक उपभोक्तावादी अर्थतंत्र – अर्थव्यवस्था के कुचक्र से किस तरह बचे रहें। भारत को मौलिक अर्थव्यवस्था विकसित करनी होगी। अभी हम लोग उधार की अर्थव्यवस्था पर काम चला रहा हें और उसी मार्ग पर चलने के लिए लालायित हैं। औद्योगिक व्यवस्था मानवीय जरूरतों की पूर्ति के लिए है। इसे सम्पूर्ण समृद्धि के केंद्र में नहीं रखा जाना चाहिए। संतुलन की भावना आवश्यक है। पाश्चात्य अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार प्रकृति के अंधाधुंध दोहन तक ही सीमित है।
भारत को अपनी नवीन अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि को ही बनाना चाहिए। अधिक से अधिक कृषि करें, धरती को संरक्षित करें, अपने प्राकृतिक संसाधनों का महत्व समझें, पौष्टिक अन्न उपजायें, धरती की खुदाई कम से कम करें। विकास के लिए मानवीय मन का दोहन करने की आवश्यकता है, न कि धरती के गर्भ को खोदकर उसमें विकास खोजने की। मनुष्य का विकास प्रकृति में नहीं है, बल्कि उसके मन की रचनात्मक शक्तियों के दोहन में है। भारत को बुद्धि और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था बनाना होगा। धन को केंद्र में रखकर राष्ट्र को समृद्ध बनाने की कामना अत्यंत भयंकर दूरगामी परिणाम लाएगा। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था अपनी संस्कृति के अनुसार विकसित करनी होगी। हमें उतने पदार्थों का उत्पादन करना चाहिए, जिससे कि हमारे मूलभूत जरूरतों की पूर्ति हो जाय। एक नागरिक के रूप में मेरी यह सदैव इच्छा रहेगी कि हम अपनी चीजों को बचाकर, सहेजकर समृद्ध बनें, न कि अपनी संपत्ति को बेचकर। समृद्धि बढ़ती है आपस में मिलने से, प्रेम और समन्वय के साथ रहने से। प्रत्येक पदार्थों का महत्व उसके सदुपयोग करने से होता है, न कि उन पदार्थों की उपलब्धता और अधिकता से। किसी भी पदार्थ को उत्पन्न करने के इंतजाम करने के पूर्व नीति निर्धारकों को यह विचार और व्यवस्था विकसित करनी चाहिए कि इससे धरती पर कचरा अधिक न फैले।

(लेखक- रुसेन कुमार चिंतक, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। रायपुर, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं।)
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