दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । सबसे बड़ा दोष क्या है?
हम इसे स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि हम ही हर बात के लिए दोषी हैं। सचमुच में किसी भी बात के लिए हमसे बड़ा दोषी और कौन होगा? चूँकि हमने अब तक अनंत मात्रा में दोष इकट्ठा किए हैं, इसलिए अब हम और अधिक दोष पाने के अधिकारी नहीं हैं।
दुनिया का सबसे बड़ा विस्मयकारी बात यह है कि हमारे दोष हमें ही दिखाई नहीं देते। 'दीया तले अंधेरा' कहावत के सबसे बड़े उदाहरण तो हम ही हैं। आखिर में ऐसा क्यों है? विचार किया जाय। हमारा मन दोषयुक्त है और हम अपने ही मन से पूछ रहे हैं कि क्या वह किसी बात के लिए दोषी है? तो क्या हमारा मन स्वयं को दोषी सिद्ध होने देगा? उत्तर है - नहीं। हमारा मन हमारे शरीर में न्यायाधीश की तरह है। वही तो सबसे बड़ा संचालक है। उसके पास हर बात का उत्तर है। वह हर बात पर निर्णय देता है। जो बात उसे नहीं मालूम, उसके बारे में भी वह निर्णय देता है, अभिमत देता है। क्या कोई न्यायाधीश अपनी ही अदालत में अपने ही विरुद्ध कोई निर्णय देगा? कोई भी न्यायाधीश अपने विरोध में कोई फैसला नहीं देता।
ऐसे ही हमारा मन किसी भी बात के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानता। वह दोषों में आकंठ डूबे रहने के बावजूद स्वयं को दोषी अनुभव नहीं करता।
यदि हम अपने मन का ठीक-ठीक निरपेक्ष ढंग से निरीक्षण करें तो हमें अनुभूत होगा कि हमारे मन में दोषों के संग्रह के अलावा कुछ भी तो नहीं है। हम जितना दोषयुक्त हैं, उतना धरती का कोई भी प्राणी दोषयुक्त नहीं होगा। हम अपने दोषों को अपने अंतस में छुपाए रखे रहते हैं।
हमारी भलाई इसी में है कि हम हर बात के लिए स्वयं को दोषी ठहराएँ और चुप रहें। अतः हम अधिक बोलने का अधिकार खो चुके हैं। इस बात को मान लेने में परेशानी क्या है कि हमारे दोषों के कारण ही हम दुःखी और अशांत हैं। यह बात हमें ठीक से समझनी होगी कि दोषों के कारण ही दुःख जन्म लेते हैं। जितने अधिक दोष उतने अधिक दुःख की पुनरावृत्ति। इन दोनों का अनुपात बराबर ही रहता है।
विद्वानों द्वारा दोषों के कारण जो दुःख उत्पन्न होना बताए गए हैं, वे इस तरह से हैः
1. दूसरे की उन्नति या सुख देखकर जलते हैं। अर्थात ईर्ष्या से पीड़ित रहते हैं।
2. सभी में दोष देखकर उसे बुरा समझते हैं। घृणा अनुभव उत्पन्न करते हैं।
3. किसी भी स्थिति में संतोष नहीं करते हैं। असंतुष्ट रहते हैं।
4. क्रोधी स्वभाव के हैं।
5. शंकित रहते हैं। यानी बात-बात पर शंका करते हैं। सबकी ओर संदेह क दृष्टि से देखते हैं।
6. दूसरों के आसरे पर ही सब-कुछ निर्भर कर देते हैं। यानी अपना योगदान देने के प्रति उदासीन रहते हैं।
कहा जाता है कि हमारे मन में प्रतिदिन विचारों की 60 हजार लहरें उत्पन्न होती हैं। साधारण रूप में मनुष्य क्या है? मनुष्य दोषों और बुराइयों का समुच्चय है। यदि कोई हमारा ठीक ढंग से छानबीन करे तो हमारे में बुराइयों और दोषों के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।
अन्य लोगों के बुरे बर्ताव के इलाज करने की प्रवृति छोड़कर पहले हमें अपने इन मानस रोगों को कम करने का उपाय सोचना होगा। इस बात को हम अपने मन में ठीक-ठीक बिठा लें कि दूसरों में दोष दर्शन की वृत्ति ही हमारे सभी मानसिक रोगों का प्रमुख कारण है। किसी भी उपाय से हमारे ये रोग कम हो जाएँगे तब हमें अन्य लोगों के दुर्व्यवहार में अपने आप कमी अनुभव होने लगेगा।
अभी तो हम दोष या क्रोध की जलन भावना से युक्त चश्मा लगाकर दुनिया को देखते हैं। इसलिए हमारी दृष्टि यथार्थ नहीं है, स्पष्ट नहीं है। हमें चीजें साफ-साफ दिखाई नहीं पड़ती, यह हमारे भीतर के रोगों के कारण है।
दूसरे के दुर्व्यवहार नाश करने का उपाय यह है कि हम बदले में सद् व्यवहार करें। दुर्व्यवहार को बदले में दुर्व्यवहार करके ठीक नहीं किया जा सकता। कोई दुर्व्यवहार का व्यवहार करता है तो यह हमारे लिए आवश्यक है कि हम वहाँ से चले आएँ और उनके विरुद्ध कुछ न सोचें और न करें। किसी दूसरे में दोष तो है ही, तभी वह दुर्व्यवहार करता है, इसमें कोई नई बात नहीं है। यदि बदले में दुर्व्यवहार किया जाय तो वही दोष हमारे में आ चिपकेंगे। हमें चाहिए कि हम अपने दोषों को बहुत बारीकी से देखें।
सार बात यह है कि हम दूसरों में दोषारोपण करके उन्हें दोषी देखते हैं और परिणाम में घृणा, द्वेष बढ़ जाते हैं, जिससे अपना ही दुःख बढ़ता है, नुकसान होता है।
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रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।
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