दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । विचार ही शत्रु, विचार ही मित्र




हर व्यक्ति अपने ही निकट होता है। स्वयं से मित्रता ही सबसे अच्छी मित्रता है। स्वयं के द्वारा स्वयं का मार्गदर्शन उत्तम मार्गदर्शन है। जिस तरह हम स्वयं के लिए एक अच्छे मित्र साबित होंगे, उसी तरह ही हमारे अच्छे विचार ही हमारे परम मित्र बनेंगे। यदि हमारे विचार अच्छे और शुभ हैं तो उसका अच्छा प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ेगा। इसी तरह ही अगर हमारा विचार प्रतिकूल है तो उसका बुरा प्रभाव हमारे जीवन पर बुरे असर दिखाएगा। हमारे बुरे विचार हमारे परम शत्रु बन जाएँगे। हमारे विचार करने के ढंग से ही हमारे साथ भली-बुरी घटनाएँ घटित होती रहती हैं। जैसे हमारे विचार और धारणाएँ होंगी, उसी तरह की बातों के लिए हमारा जीवन आकर्षित होते चला जाएगा। 

मनुष्य के मन में हर क्षण विचारों की तरंगे उठती रहती हैं। व्यक्ति के साथ जिस तरह समाज में का व्यवहार होता है उसी के अनुसार ही व्यक्ति और भावनाएँ बनाते रहता है। प्रत्येक व्यक्ति को उसका अपना विचार अत्यंत प्रिय होता है। विचारों के प्रति यह प्रियता उसके अपने मन के कारण होती है। असल में श्रद्धा के अनुसार मनुष्य के विचार होते हैं और विचारों के अनुसार ही उसका स्वरूप होता है। मनुष्य के सबसे करीब होते हैं उसके विचार। विचार इतने अधिक समीप हैं, जितने समीप उसके हाथ-पैर और आँख-कान आदि अंग भी नहीं हैं। 

जीवन भर हम अपने विचारों के साथ रहते हैं। मनुष्य विचारों का ही परिणाम होता है। कोई भला कैसे समझे कि कौन से अच्छे विचार हैं और कौन से बुरे विचार हैं। जिन विचारों के परिणाम स्वरूप हमें दुःख और हानि होती है, वे अशुभ विचार होते हैं और जिन धारणाओं के परिणाम स्वरूप सुख और लाभ होते है, वे शुभ विचार होते हैं। ऐसे ही कुछ नैतिक विचार होते हैं और कुछ अनैतिक विचार। कुछ नीति सम्मत होते हैं तो कुछ विचार अनीति युक्त होते हैं। कुछ विचारों के कारण विषाद, क्रोध, जलन और प्रतिशोध उत्पन्न होते हैं और कुछ विचारों के कारण प्रेम, सद्भाव और सहयोग की भावना जागृत होती है। 

निश्चय ही कुछ विचार हमारे मन को दुखी करते हैं तो कुछ विचारों के द्वारा हमारे मन को संबल और आसरा मिलता है। वास्तव में, हमारे शुभ विचार ही हमारी असली संपदा हैं। अच्छे विचारों की अधिकता से ही हमारे जीवन में अच्छाई का संचार होगा। 

जिस समय मन में बुरे विचार प्रवेश करते हैं उसी क्षण हम चिन्ता, भय और निराशा का अनुभव करते हैं। उस समय हम प्रायः भूल जाते हैं कि अब आगे क्या करना चाहिए। परंतु असल में वे बुरे विचार इसीलिए आते हैं क्योंकि हम उन्हें आने देते हैं, बुलाते हैं और रहने देते हैं। 

दुनिया में भले-बुरे अनुभव होते ही रहते हैं। बहुत बार तो हम अपने ही मन की उलझी हुई कल्पना के अनुसार भले को बुरा और बुरे को भला मान बैठते हैं। हमें यह निश्चय करना है कि किसी ने किसी कारणवश कभी बुराई भी की हो, तो भी उसके लिए विषाद, क्रोध और बदला लेने के विचार को त्याग देना चाहिए। आप कितना भी कुछ भी कर लें, ये विचार कभी भी कल्याण नहीं लाएँगे, बल्कि अकल्याण ही करेंगे। किसी को आघात करने वाले विचारों से न तो आपके हृदय का घाव ही भरेगा और न ही समक्ष व्यक्ति को किसी प्रकार का दण्ड मिलेगा। यह बहुत संभव है कि वह पुनः  ज्यादा तीव्र ढंग से हानिकारक प्रतिकार कर सकता है। 

क्या यह हमारे लिए आवश्यक नहीं कि आनंद, दया, प्रेम, सेवा और शांति आदि उत्पन्न करने वाले विचारों को बार-बार मन में लाया जाय? विचारों की शुद्धि ही मन की शुद्धि है। क्या यह आवश्यक नहीं कि मन में से अशुभ-बुरे विचारों का नित्य बहिष्कार किया जाय और शुभ – अच्छे विचारों का नित्य सत्कार, स्वागत, संरक्षण और वर्धमान किया जाय? क्या यह हमारे लिए आवश्यक नहीं कि हम अपने मन के स्वामी बनें – न कि मन के पराधीन? क्या यह हमारे लिए आवश्यक नहीं कि हमारा जीवन अच्छे विचारों के द्वारा संचालित हो? आइए हमारे प्रति दूसरों के प्रेम, सहयोग, सहृदयता और उदारता का स्मरण करें, पवित्रतम विचारों से अपने मन को सराबोर कर लें। 

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रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)

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