दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । भाई के साथ हमारा कैसा संबंध हो?


सगे भाई के साथ हमारा संबंध बहुत अच्छा रहना ही चाहिए। भाई के साथ कमतर संबंध न तो शोभा देता है और नहीं इसका कोई मोल है, अर्थ है। भाई के साथ हमारा संबंध शुभ, प्रेम और सहयोग का ही है। भाई में न तो दोष देखना चाहिए और न ही भाई के किसी दोष को रेखांकित करना चाहिए। 

रक्त संबंध होने के कारण हमारा शरीर हमारे भाई के शरीर का ही विस्तार है। हमारे शरीर तथा हमारे भाई के शरीर में न भेद है और न ही भेद होने का कोई कारण है। अंतर यदि किसी बात का है भी तो वह केवल मन के स्तर पर है। इसके अलावा तो किसी भी भेद का कोई अर्थ ही नहीं है। मतभेद होना सामान्य बात है, परन्तु यह गंभीर विषय नहीं है। हमारा भाई हमारे प्रेम का अधिकारी है। वह कभी भी तिरस्कार का अधिकारी हो ही नहीं सकता। भाई के प्रति प्रेम नित्य है, द्वेष अनित्य एवं आगंतुक है। 

पता नहीं हमारे में यह प्रवृत्ति कहाँ से आ गई है कि हम अपने ही भाई में कब दोष देखने लग गए। भाई ही क्यों, कभी भी किसी आदमी में दोष होता ही नहीं। जिस समय हमने अपनी दृष्टि बदल दी, उसी समय ही हमारे समक्ष सभी दृश्य बदल गए! जिस समय हमने फर्क करना प्रारंभ किया, उसी समय सभी जगह विरोधाभास दृश्यमान होने लग गए। हमारी बदली हुई दृष्टि ही सभी बातों के लिए जिम्मेदार रहती है। द्वेष दृष्टि होने पर सब दोष रूप हो जाता है। किसी भी बात पर द्वेष आने पर गुणों पर भी हमें दोष दिखाई पड़ने लगते हैं। 

प्रेम संयोजक वस्तु है। प्रेम का स्वभाव है – मिलाना, अनेक को एक करना। द्वेष का स्वभाव है – बिगाड़ना, एक को अनेक करना। द्वेष का काम है पृथक करना, अलगाव पैदा करना। द्वेष आते ही प्रेम समाप्त हो जाता है। जबकि प्रेम आते ही दोष समाप्त हो जाता है। सबसे बड़ा है स्वार्थ का दोष। अपनों के बीच स्वार्थ आ जाने पर त्याग करने की भावना शुष्क हो जाती है। प्रेम को त्याग का आवरण डालकर ही बचाया जा सकता है। भाई-भाई में नित्य ही स्नेह रहता है। स्नेह को सँजोये रखना आज की महति आवश्यकता है। भाई के लिए स्नेह की भावना किस विधि विकसित होती है, इसका भी विचार करना आवश्यक है। 

स्वार्थ है - त्याग का अभाव। स्वार्थ रहने पर अर्थ का अनर्थ निकलेगा ही। स्वार्थ के आते ही व्यक्ति अपने ही भाई के साथ छीना-झपटी, छिपावट, चोरी आदि का व्यवहार करने लगता है। जबकि अपनों के बीच छीना-झपटी का सवाल ही नहीं पैदा उभरना चाहिए। भाइयों के मध्य आखिर परायापन कहाँ से आ धमकता है? परायापन आगंतुक तथा दोषयुक्त भावना है। 

आगंतुक भावनाओं को अपनों के ऊपर प्रयोग में नहीं लाना चाहिए, भाइयों पर तो बिल्कुल ही नहीं। भाई के स्नेह की विशिष्टता के समक्ष बड़ा से बड़ा स्वार्थ बहुत अल्प और तुच्छ है। अतः तुच्छ बातों को बहुत अधिक मान नहीं मिलना चाहिए। 

भाई-भाई में प्रेम भाव स्थायी रूप से बना रहे, इसका उत्तरदायित्व दोनों ही भाइयों पर रहता है। भाई से विलग होने का विचार भी आगंतुक होता है। किसी भी कारण से विभेद होने पर उस भूल को सुधार लीजिए। ईमान बिगाड़कर भाई का हक अपने हिस्से मत रखिए। भाई को मुझसे भी अधिक मिले, ऐसी भावना रखिए और अपने भाई को अधिक दीजिए भी। भाई का किसी भी रूप में निरादर होने से भाई के संबंध का तिरस्कार होता है। भाई के लिए हित चाहने से ही बंधुत्व भावना का आदर होता है। 

बड़े भाई को छोटे भाई पर विशेष अनुराग रखना चाहिए। छोटे भाई को बड़े भाई के प्रति अगाध अनुराग और आदर रखना चाहिए। अपने भाई को अधिक प्रेम करने में कोई भी संकोच मत रखिए। उम्र का बड़ा महत्व है। आप उम्र में बड़े हैं तो अपने बड़प्पन का प्रमाण भी दीजिए। यदि आप उम्र में छोटे हैं तो भाई के प्रति विनम्रता का प्रमाण प्रस्तुत कीजिए। यह नीति और सिद्धांत की बात है। 

यह उपकार-परोपकार करने जैसी बात नहीं है। अपने भाई के अपराधों और गलती को क्षमा कीजिए। उसे हृदय में उच्च स्थान प्रदान कीजिए। आपका बर्ताव निष्कपट, प्रेमपूर्ण और सहृयी होगा तो उसका हृदय किसी दिन अवश्य जागेगा। उसका मनोभाव अनुकूल हो जाएगा। अपने भाई की भलाई के लिए नित्य ही प्रार्थना करनी चाहिए। आप कितनी भी तरक्की कर लीजिए, पर आप बंधुत्व से वंचित मत रहिए। परस्पर संबल बनिए। 

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रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।

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