दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार। हमारा शरीर एक उपजाऊ खेत है


हम अपने शरीर के साथ प्रति क्षण, प्रति दिन रहते हैं। हम अपने शरीर से एक दिन भी अलग नहीं रहते। हम जिधर भी जाते हैं, हमारा शरीर साथ-साथ चलता है। इतना समीप होने के बाद भी हम अपने शरीर के बारे में बहुत कम ही जानते हैं। हमें अपने ही अंगों के बारे में जानने के लिए विशेषज्ञ डाक्टरों की आवश्यकता पड़ती है। शरीर में थोड़ी-सी भी खामी आने पर डाक्टरों से परामर्श लेने पड़ते हैं। 

हमारे विज्ञान ने आज इतनी अधिक प्रगति कर ली है कि हमें प्रत्येक अंग के लिए एक विशेषज्ञ डाक्टर उपलब्ध है। विज्ञान की मदद से मनुष्य के एक-एक अंग के बारीक से बारीक हिस्से की भी छानबीन कर ली गई है। फिर भी बहुत कुछ हमारे लिए शरीर के बारे में जानना अभी भी शेष है। हमारा शरीर हर पल परिवर्तनशील है। यह प्रत्येक क्षण बदलते रहता है। इसीलिए इसकी सूक्ष्मताओं को पकड़ पाना संभव नहीं हो पाया है। 

इतनी अधिक चिकित्सकीय प्रगति होने के उपरान्त भी शरीर के अनेक रोगों का इलाज होना अभी भी शेष है। हजारों वर्षों के परिश्रम के बाद भी मनुष्य के मन, प्राण और विशिष्ट अंगों के स्वभावों के बारे में ठीक-ठीक अनुमान लगा पाना आज भी कठिन कार्य है। 

ऐसा माना जाता है कि हमारा शरीर पाँच तत्वों – पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश से बना हुआ है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि हमारा शरीर तीन तरह के भिन्न शरीरों – स्थूल शरीर (अन्नमय), सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर से मिलकर बना हुआ है। हम जो भी सेवन करते हैं, उससे हमारे शरीर के ढांचों एवं अंगों को पोषण मिलता है तथा उसमें विकास का क्रम बना रहता है, इसलिए इसे अन्यमय शरीर कहा जाता है। दिखाई पड़ने के कारण इसे स्थूल शरीर कहते हैं। 

पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि – इन सत्रह तत्वों से बने हुए शरीर को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। इनके कार्य करने की विधि को स्पष्ट रूप से देखा नहीं जा सकता इसलिए इसे सूक्ष्मशरीर कहते हैं। जिसकी उपस्थिति से यह शरीर जीवित रहता है उसे कारण शरीर कहते हैं। अज्ञान को कारण शरीर कहा गया है। मनुष्य को बुद्धि तक का तो ज्ञान रहता है, लेकिन बुद्धि से आगे की बातों का ज्ञान नहीं होता, इसलिए अज्ञान कहा जाता है। यह अज्ञान सम्पूर्ण शरीरों का कारण होने से कारणशरीर कहलाता है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में कारणशरीर को स्वभाव, आदत और प्रकृति कहा गया है और इसी को आनंदमय कोश भी कहा गया है। शरीर को कोश इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अनंत सूक्ष्म कोशों से बना है। 

हमारे शरीर में परिवर्तन एक क्षण भी नहीं रुकता। नष्ट होता है और तुरंत बनता भी है। यह इतनी जल्दी बदलता है कि इसको दुबारा देखा नहीं जा सकता। 

ग्रंथों में शरीर को क्षेत्र या ऊर्वर भूमि भी कहा गया है। हमारा शरीर एक विशाल ऊर्वर खेत की भांति कार्य करता है। जैसे किसी खेत में अनेक प्रकार के बीज डालकर, बो कर फसलों की खेती की जाती है, वैसे ही हमारे शरीर में भी कर्मों की प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं। जिस प्रकार से खेत में जैसे बीज बोए जाते हैं, वैसा ही उसकी फसलें होती है और परिणाम में उसी स्वभाव और प्रकृति के फूल, फल और बीज उत्पन्न होते हैं, अनाज आदि पैदा होते हैं। 

यह शरीर बहुत उपजाऊ है। इस शरीर में अरबों वर्षों का हिसाब-किताब जमा है। उत्पत्ति से लेकर अभी तक के विकास क्रम का विवरण यहाँ संग्रहित है। इस शरीर में अनंत कोशिकाएँ, जीव, सूचनाएँ, अनंत जानकारियाँ, शक्तियाँ, बल, ज्ञान आदि संजोये हुए हैं।

वर्तमान में शरीर के अन्दर जो कुछ भी बोया जाता है, या प्रवेश रहता है, वह सब अनंत समय तक के संग्रहित हो जाता है। हमारे शरीर के अंदर जो भी पदार्थ – दृश्य एवं अदृश्य ध्वनि, विचार, विद्या, तरंगें, भोज्य पदार्थ, जीवाणु, विषाणु, रक्त, वीर्य सब संग्रहित होकर विद्यमान हैं और अनुकूल वातावरण पाकर फल देते हैं। 

इस शरीर में जैसे विचारों की खेती होती है, वैसी ही उसकी फसलें तैयार होती हैं। हमारी जिम्मेवारी है कि इस खेत रूपी शरीर पर सोच विचार करके ही बीज रोपित करें। 

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रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।


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