दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । कर्मयोगी बनिए
हमारे समाज में जो कोई सज्जन उत्कृष्ट सफलता प्राप्त करते हैं तो उसके प्रति आदर व्यक्त करने के लिए उनके नाम के आगे कर्मयोगी शब्द जोड़ दिया जाता है। कर्मयोग दो शब्द – कर्म और योग से मिलकर बना है। मनुष्य में कर्म करने की शक्ति होती है, सृजन करने का सामर्थ्य होता है। मनुष्य नए विचार और नए पदार्थों की रचना कर सकता है। मनुष्य के भीतर मौजूद सृजनात्मक शक्ति को ही कर्म करने की शक्ति कहते हैं। योग का अर्थ होता है जुड़ाव या जोड़।
शास्त्रीय अर्थ में कर्म योग्य एक बहुत ही आदरणीय शब्द है। कोई भी मनुष्य अल्पज्ञ हो या बहुविज्ञ क्यों न हो, वह सुगमतापूर्वक मान सकता है कि जो कुछ मेरे पास है, वह वास्तव में मेरा नहीं है, बल्कि किसी के द्वारा, किसी के माध्यम से मिला हुआ है, जैसे – शरीर माता-पिता से मिला है, विद्या-योग्यता गुरुजनों से मिली है इत्यादि।
कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य का सामाजिक जीवन एक-दूसरे की सहायता करके या सहायता प्राप्त करके ही चलता है। निर्धन हो या धनी, किसी का जीवन बिना सहयोग से नहीं चलता। अगर हमने किसी से कोई वस्तु ली है जो हमें भी किसी को कोई वस्तु देनी पड़ती है। किसी ने हमारी सहायता या सेवा की है तो हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम भी बदले में किसी की सहायता और सेवा करें। परस्पर सेवा, सहायता आदि करना हमारा मुख्य कर्तव्य है। इसी का नाम कर्म योग है।
कर्मयोग का पालन करना सबके लिए आवश्यक है। वैसे तो हर व्यक्ति जीवन भर कर्तव्य पालन करता ही है। वास्तव में देखा जाय तो कर्तव्यपालन करने में न कोई श्रम लगता है और न हीं इसके पालन में किसी तरह की पराधीनता अनुभव होता है। कर्तव्य पालन में परिश्रम नहीं लगता, बल्कि यह सहज कर्म है।
लेकिन कुछ विरले लोग होते हैं, जो अपना कर्तव्य पालन अधिकतम सीमा तक कर पाते हैं, उन्हें ही हम कर्मयोगी पुकारते हैं। ऐसे व्यक्ति जो अच्छे एवं रचनात्मक कर्मों के द्वारा समाज को सुख पहुंचाते हैं, उनकी बड़ी गरिमा और पूछपरख रहती है।
कर्मयोग की भावना से परिपूर्ण कार्यों का समाज में बहुत रचनात्मक प्रभाव पड़ता है। कर्मयोगी प्रत्येक कर्म को कर्तव्य निभाने के लिए करते हैं। उसके कार्य में परहित की भावना रहती है। कर्मयोग की भावना से युक्त कार्य करने से उसमें स्वतः ही शक्ति जागृत हो जाती है। निःस्वार्थता एक रचनात्मक भावना है।
कर्मयोगी, लोगों और संसार की भलाई के लिए कार्य करता है। एक कर्मयोगी भली प्रकार से जानता है कि संसार के पदार्थ कर्म करने पर ही मिलते हैं। कर्म दूसरों के लिए होता है और योग अपने लिए होता है। कर्म में चुम्बकीय शक्ति होती है। मनुष्य सेवा कर्म के द्वारा पशु-पक्षी, साधारण मनुष्य से लेकर संत-महात्मा को भी अपना बना सकता है, अपना हितैषी बना सकता है।
कर्मयोगी न तो परिस्थिति बदलने की प्रतीक्षा करता है और न ही अनुकूल परिस्थित ढूंढ़ता है। वह तो केवल परिस्थिति का सदुपयोग करता है। वर्तमान में उपस्थित परिस्थिति का सदुपयोग ही कर्मयोग है। कर्म करने का दायित्व उसी पर आता है, जो कुछ कर सकता है, जिसमें करने की योग्यता है और जो कुछ पाना भी चाहता है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, धन, सम्पत्ति आदि जो कुछ भी हमारे पास है, यह सब संसार की ही वस्तुएँ हैं, अतः इनकी उपयोगिता संसार की सेवा में प्रयोग आने के कारण ही है। कर्म योग सिद्ध होने पर व्यक्ति में तीव्र लगाव, पाने की लालसा, जीने की इच्छा और मृत्यु का भय – यह सब समाप्त हो जाता है और केवल बचता है कर्तव्य पालन का बोध।
एक कर्मयोगी अपने लिए कम और दूसरों के लिए अधिक चाहता है। वह अपने लिए केवल जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक चीजें चाहता है, शेष चीजें वह अन्यों की सेवा और सहयोग के लिए चाहता है। कर्मयोग का पालन करने से यश, मान और प्रतिष्ठा बढ़ती है। कर्मयोग में विवेक की प्रधानता रहती है। कर्मयोगी को यह भलीभाँति पता रहता है कि केवल और केवल उसके जीवन की सत्यता है और शेष सभी चीज अस्थायी है, अतः अस्थाई चीजों के प्रति वह कम से कम लगाव रखता है। कर्मों और पदार्थों के साथ हमारा संबंध बनता है और बिगड़ता है। ऐसी ही कर्म का आरंभ और समाप्ति होती है, अतः कर्मयोगी निरंतर कर्म करने पर ही ध्यान लगाता है। सतत प्रयत्नशील रहने से कर्मयोगी चिंता एवं शोक से मुक्त रहते हैं। दुनिया की प्रत्येक वस्तु सेवा और सदुपयोग के लिए मिली है, इसका बोध होना ही कर्मयोग है।
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रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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