दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । दोषों से ढकी रह जाती हैं अच्छाइयाँ
एक साधारण मनुष्य के भीतर चार दोष रहते ही हैं। ये चार दोष है - भ्रम, प्रमाद, अपने दोष को छुपाना और अनुभवहीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना। ये चार दोष मिलकर हमें नित्य ही पतन की ओर ले जा रहे हैं। ये दोष रोज ही हमारे भीतर बढ़ रहे हैं, घट नहीं रहे हैं। इन चार दोषों से छुटकारा मिलना किसी के बस की बात नहीं । इन बुराइयों को कम करने का उपाय हमारे पास नहीं है और न ही भविष्य को लेकर कोई योजना भी है।
इन दोषों को सामने खड़ा करके यदि हम स्वयं के क्रियाकलापों का अवलोकन करें तो हम पाएँगे कि हम रोज नई-नई गलतियों के द्वारा, इन दोषों को रोज दोहराते रहते हैं। हमारे भीतर ये दोष सैकड़ों और हजारों की संख्या में संग्रहित हो चुके हैं, ये निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं। हजारों, लाखों दोषों के भार को लेकर जीवन में आगे बढ़ पाना असंभव ही है। यदि कोई हमारे सिर के ऊपर पत्थर का एक-एक टुकड़ा रोज डाल दे तो हमारा शरीर दो-चार वर्षों में सैकड़ों टन पत्थरों के भार से विकृत हो जाएगा।
हम लोग अक्सर अपनी गलती और खामियों को छुपाने का हर संभव प्रयास करते हैं। लेकिन गलतियाँ छुपती नहीं है। गलतियाँ या दोष अपना परिणाम उत्पन्न करती ही हैं। यदि हमने किसी बात को छुपाई है तो वह किसी दिन उजागर हो जाएगी।
भ्रम क्या है। किसी वस्तु को न पहचान करके उसे अन्य वस्तु समझना भ्रम कहता है। जैसे पीतल की चेन को कोई सोने की समझता है। एक वस्तु को सही रूप में न पहचान कर गलत रूप में पहचानना भ्रम कहलाता है। हमारा मन हर बात के लिए एक भ्रम उत्पन्न कर लेता है। भ्रमित मन के कारण हम अपने समक्ष आए हुए अवसरों को पहचान नहीं पाते।
प्रमाद क्या है। मन की असावधानी को प्रमाद कहते हैं। मन की लापरवाही को आलस्य या प्रमाद कहा जाता है। मन में भ्रम उत्पन्न होने के कारण वह प्रमाद से ग्रसित हो जाता है। एक ही गलती को बार-बार दोहराना और उसमें गरिमा का अभाव होना प्रमाद का लक्षण है। यदि कोई व्यक्ति हमारे प्रति विशेष उपकार करके हमारे दोष को उजागर करता है, बताता है, समझता है तो हम उसे ढकने की कोशिश करते हैं। अपनी गलती स्वीकार करने के महान अवसर को खो देते हैं। इस तरह हमारा अहंकार बढ़ता जाता है।
हम सब अपने दोष को छुपा कर रखना चाहते हैं। कोई भी हमारा दोष बताए तो हम उसका तुरंत प्रतिकार करते हैं। हमारे भीतर ऐसी कौन-सी भावना है जिसके कारण हम अपने दोष को छुपाए रखना चाहते हैं। दोष को छुपाए रखने का अर्थ है अपनी बीमारी को छुपाए रखना। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि रोग एक दिन बड़ा होकर हमें ही परेशान करेगा। जिस विषय में हमारी समझ नहीं है फिर भी उस विषय में हस्तक्षेप करना चाहते हैं, यह बुरी आदत है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसके दोष छुपे रहे, यह हमारे भीतर बढ़ती बीमारी का प्रतीक है। हर चीज में दखल देने की प्रवृत्ति हमारे भीतर बढ़ रही है।
अनुभव हीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना हमारी आदत बन चुकी है। स्वयं को हर विषय का ज्ञानी समझना हमारा स्वभाव बन चुका है। चाहे ज्ञान हो या न हो, हम हस्तक्षेप करना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि हर बात के लिए अनुभव की जरूरत होती है, हम हर बात में टांग अड़ाते हैं। सलाह नहीं मांगे जाने पर भी हम सलाह दे डालते हैं। प्रत्येक विषय के विशेषज्ञ नहीं होने पर भी हम अपनी राय असावधानी से व्यक्त कर देते हैं।
हमारा दोष तभी मिटेगा जब हम स्वयं के दोष को देखेंगे और उनका भलीभाँति विश्लेषण करेंगे। दोषों पर नजर डालने से ही हमारे दोष कुछ मात्रा में कम होंगे। सफलता पर गर्व नहीं बल्कि अपनी गलतियों पर हमें लज्जा का अनुभव होना चाहिए। हमारे भीतर दोष अधिक हैं तो हमारी अच्छाइयाँ छिपी रह जाएँगी। हमारी अच्छाइयाँ दोषों की अधिकता से ढकी रह जाती हैं।
***
रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
सुधि पाठकों से निवेदन है कि रचना अच्छी लगने पर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया अवश्य लिखिए।
ब्लॉग उपयोगी लगने पर सब्सक्राइब करना न भूलें। कोई रचना आपके मन को छुए तो रचना के लिंक को सोशल मीडिया पर जरूर साझा कर दीजिएगा, ताकि अधिक लोग उसे पढ़ सकें।




Comments