दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । हम कौन हैं और कहाँ जा रहे हैं?
हमें दो प्रश्न स्वयं से नित्य पूछने चाहिए – मैं कौन हूँ और मैं कहाँ जा रहा हूँ? मैं कौन हूँ का यहाँ अर्थ है – मुझमें क्या सामर्थ्य है? मुझमें क्या विशेषता है? और मेरा क्या कर्तव्य है? मैं कहाँ जा रहा हूँ का यहाँ अर्थ है – मैं जहाँ पर हूँ वहाँ से चलकर मुझे कहाँ पहुँचना है, अर्थात् मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है। कुछ बनना, कुछ पाना है, कुछ होना है।
हम किसी न किसी परिवार, संस्थान, समाज या राष्ट्र का हिस्सा हैं, इसलिए हमें सामूहिक रूप से यह सवाल नित्य पूछना है कि हम कौन हैं और हम कहाँ जा रहे हैं? अर्थात सामाजिक रूप से हमारी प्रगति कितनी हुई है और हमारी मंजिल का अगला छोर क्या है? यह दो प्रश्न हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
अगर हम अपने जीवन में व्यक्तिगत उत्कृष्टता चाहते हैं तो 'मैं कौन हूँ और कहाँ जा रहा हूँ', यह सवाल हमें हर पल स्वयं से पूछते रहना चाहिए, ताकि हम अपने लक्ष्य के प्रति सचेत हो जाएँ। इन दोनों सवालों को निरंतर अपने समक्ष रखने से हम बहुत सारी समस्याओं से बचे रह कर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते जाएँगे।
स्वयं की क्षमता और अक्षमता को पहचान नहीं पाने और रोज ही पथ भ्रष्ट होने के कारण हम निरंतर समस्याओं से घिरे रहते हैं। इससे हमारी ऊर्जा विसर्जित हो जाती है, एक दिशा में नियोजित नहीं हो पाती और हम दिन-रात चलकर भी कहीं नहीं पहुँच पाते। इसीलिए ये हमारे लिए बहुत मूल्यवान हैं।
आज के समय में हर किसी के पास उसके जीवन का लक्ष्य है। कोई नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे है तो कोई अपने कारोबार को और बड़ा बनाने के लिए योजना बना रहा है। कोई ऊँचे पद पर पहुँचना चाह रहा है तो कोई अपने पद पर टिके रहने के लिए अपने आपको निरंतर सुधार रहा है। यह देखा गया है कि 100 में से केवल एक ही अपने लक्ष्य पर पहुँच पाते हैं, मनवांक्षित सफलता अर्जित कर पाते हैं। एक सामान्य व्यक्ति समय रहते इसलिए अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता क्योंकि उसे यह बात ठीक से मालूम नहीं होती कि वह कौन है और उसे आगे कहाँ तक जाना है।
ऐसे ही अनेक संस्थानों, समाज, कंपनियों और संगठनों को यह नहीं मालूम हो पाता कि सामूहिक रूप से 'वे कौन हैं', उनकी 'सामूहिक पहचान' क्या है और उनकी 'विशिष्ट मंजिल' क्या है? बड़े संस्थानों के नेतृत्व कर्ताओं को यह उपाय करना चाहिए कि वे अपने सभी सहकर्मियों से निरंतर पूछते रहें कि उनके संगठन की विशेषता क्या है और उन्हें कितनी अधिक मात्रा तक सफलता हासिल करनी है।
राज्यों और राष्ट्र की अगुवाई करने वाले राजनेताओं को नित्य ही ये प्रश्न पूछने चाहिए कि उनके राज्य और राष्ट्र के लोगों की क्या-क्या विशेषताएँ हैं, सामर्थ्य हैं और उन्हें नियत समय में राज्य और राष्ट्र की प्रगति को कितनी सीमा तक आगे ले जाना है। यह अनुभव किया गया है हम निजी स्वार्थों की पूर्ति में संलिप्त रहने के कारण सामूहिक कर्तव्यों को अक्सर ही भूल जाते हैं। प्रत्येक राष्ट्र का एक सामूहिक उद्देश्य होता है - सामूहिक प्रगति करना, इसे हर पल याद रखा जाना चाहिए।
मनुष्य में दो प्रकार के दोष पाए जाते हैं। पहला है – मति भ्रम और दूसरा है – आलस्य। भूलने की बीमारी सब में होती है और सभी लोग अपने कामों को बार-बार टालते रहते हैं। लोभ, लालच, आपराधिक कर्म, अहंकार, झूठ, बेइमानी आदि के कारण ये दो दोष हम सबके भीतर पाए जाते हैं और ज्वार-भाटे की तरह निरंतर घटते-बढ़ते रहते हैं। मति भ्रम और उस पर आलस्य का बोझ रहने के कारण हम अपनी क्षमताओं को देख नहीं पाते, पहचान नहीं पाते। चूँकि हम अपनी क्षमताओं के प्रति अनभिज्ञ रहते हैं इसलिए हममें अपने लक्ष्य के प्रति उदासीनता बनी रहती है। हम कौन हैं? और हम कहाँ जा रहे हैं? इस प्रश्न को बार-बार स्वयं से पूछते रहने से पथभ्रष्ट होने की संभावना को कम करने में बहुत मदद मिल सकती है।
हम कौन हैं? और हम कहाँ जा रहे हैं?, अगर हमें इन दो प्रश्नों के जवाब स्पष्ट रूप से नहीं मिल रहे हैं, तो हमें निःसन्देह ही अपने लक्ष्यों तक पहुँचने में कुछ अधिक समय लग सकता है। इन दो प्रश्नों की अवहेलना होने से हम अनावश्यक के उलझनों में उलझ जाते हैं, जिससे कि तन, मन, धन, श्रम, बुद्धि, समय और लक्ष्य की हानि हो जाती है। आज ही अपनी विशेषता को पहचानने के लिए अपनी डायरी पर कुछ गुणा-भाग कीजिए और अपने जीवन को सकारात्मक दिशा दीजिए ताकि आप आगे आने वर्षों में एक नई मुकाम पर पहुँच सकें।
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रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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