दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । सहृदयता और रचनात्मक तर्क का आश्रय लीजिए
रचनात्मक तर्क और सहृदयता बड़ी-बड़ी विपदाओं को टाल देती हैं। ये दो गुण संकट को उबारने वाले हैं। समय पर रचनात्मक विचार आ जाय और ततक्षण आत्मीयतापूर्ण व्यवहार किया जाय तो सिर पर मंडराते संकट से छुटकारा मिल सकता है। विनम्रता में आत्मीयता का ही समावेश रहता है। एक कहानी है। बहुत–सी भेड़-बकरियाँ जंगल में चरने गईं। उनमें से एक बकरी चरते-चरते एक लता युक्त झाड़ी में उलझ गई। उसको उस लता से निकलने में बहुत देर लगी। जबकि अन्य सब भेड़-बकरियाँ शाम होने पर अपने घर पहुँच गयीं। इधर अंधेरा गहराने लगा।
उलझी लताओं से किसी तरह निकल कर वह बकरी घूमते-घूमते एक तालाब के किनारे पहुँची। वहाँ किनारे की नमीयुक्त जमीन पर सिंह के पैरों के निशान अंकित थे। वह बकरी सिंह के चरण-चिन्ह के पास बैठ गई। रात में हिंसक जानवर वहाँ पानी पीने आया करते थे। उस रात भी झुंड में जानवर आए। जंगली सियार, भेड़िया, बाघ आदि जो भी जानवर आते उस बकरी को देखकर लालच भरी नजरों से उसके आस-पास मंडराते।
वह बकरी अत्यंत दीनहीन अवस्था में थी। वह अत्यंत विनम्र बकरी थी। उसकी बुद्धि में रचनात्मक तर्क करने की शक्ति थी। वह अत्यंत सहृदय स्वभाव की बकरी थी। उसे अपने ज्ञान और विनम्रता पर गहन आस्था थी। वह किसी अच्छे खानदान में पली-बढ़ी थी। भय, निराशा आदि से उसका कभी सामना ही नहीं हुआ। उसे सब ही सहृदयी लगते थे।
जब हिंसक जानवरों ने उसके ऊपर हमला करने की कोशिश की तो उसने आवाज लगाकर कहा कि सावधान हो जाओ। मुझ पर हमला करने के पहले यह ठीक प्रकार से देख लो कि मैं किसके शरण में हूँ।
जानवरों ने उस पद-चिन्ह को पहचान लिया और स्वयं ही घोषणा करने लगे कि यह तो सिंह के चरणों के निशान हैं। सिंह के चरण-चिन्ह देखकर उनके मन में भय समा गया। सब जानवरों के कहा, जल्दी भागो यहाँ से। सिंह आ जाएगा तो हमको मार डालेगा।
इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर वहाँ से भाग गए। अंत में, जिसका चरण-चिन्ह था, वह सिंह स्वयं आया। वह भी वहाँ रोज ही पानी पीने आया करता था। जंगल के राजा सिंह ने बकरी से बोला – "इतनी रात गए तू जंगल में अकेली कैसे बैठी है? तुम्हें क्या परेशानी है। तुम्हें यहाँ घूमते हिंसक जंगली जानवरों का भय नहीं ! तुम तैयार हो जाओ। आज तुम ही मेरा भोजन बनोगी। तुम्हें खाकर ही आज की रात गुजरेगी।"
बकरी ने सिंह से कहा – "यह चरण-चिन्ह देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिन्ह है, उसी के शरण में बैठी हूँ।"
सिंह ने समीप जाकर उस पद-चिन्ह को देखा तो उसे पता चला कि यह ताजे पद-चिन्ह तो उसी के हैं। कल ही तो वह पानी पीकर यहाँ से गुजरा था।
सिंह ने बकरी से कहा – "यह मेरे पद-चिन्ह है। अतः तुम मेरे शरण में हो। तुम्हारी रक्षा करना मेरा परम कर्तव्य है।"
सिंह ने बकरी को आश्वासन दिया कि अब तुम किसी बात का भय न करो, निर्भय होकर सुबह होने की प्रतीक्षा करो।
जल पीने के लिए वहाँ जब हाथी आया तो सिंह ने उससे कहा – "तू इस अत्यंत विनयशील बकरी को अपने पीठ पर चढ़ा ले। इसको जंगल में चरा कर लाया कर और हरदम ही अपनी पीठ पर रखा कर, नहीं तो तू जानता नहीं मैं कौन हूँ? "
सिंह की बात सुनकर हाथी वैसा ही करने लगा। उसने अपनी सूँड से झट बकरी को पीठ पर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथी के पीठ पर बैठे-बैठे ही वृक्षों के ऊपर की कोपलें खाया करती।
जब हम विनम्रतापूर्वक किसी के आश्रय हो जाते हैं तो वह हमारी रक्षा करने के लिए नैतिक रूप से प्रतिबद्ध हो जाता है। विनम्रता और सहृदयता के शरण में होने पर प्रकृति की अदृश्य शक्तियाँ सहयोग करती हैं। अंतस मन में सकारात्मक भाव और सहृदयता है तो सब ही आपके ऊपर स्नेह रखेंगे और सहयोग करेंगे। बलशाली लोगों के साथ विनम्रता और रचनात्मक तर्क शक्ति का आश्रय लेकर उन्हें अपना रक्षक बनाया जा सकता है। विनम्रता और बुद्धि बल का सकारात्मक दिशा में उपयोग के द्वारा निर्बल भी स्वयं को अनेक परेशानी से मुक्त करा सकता है।
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(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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We are like the goat, and ought to be like the goat, keeping calm during crisis and be ready to let go of our ego and remain humble.
This helps us think rationally to come out of trouble. A tranquil mind not only helps us sail through the problem, it actually helps us to convert adversity into an opportunity.
Arun Arora