दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । ज्ञानाभाव में मनुष्य विपत्तियों से घिर जाता है


ज्ञान की आवश्यकता मनुष्य को प्रत्येक क्षण पड़ती है। ज्ञान के बिना हमारा कोई भी कार्य आगे नहीं बढ़ता। ज्ञान के अभाव में हमारा कोई भी काम संपन्न नहीं होगा। ज्ञान के अभाव में काम बिगड़ जाता है। भोजन करने के लिए भोजन करने का ज्ञान चाहिए। पढ़ने के लिए पढ़ाई करने का ज्ञान चाहिए। चलने के लिए उचित ढंग से चलने के बारे में ज्ञान चाहिए। देखने के लिए किस तरह देखा जाय, इसका भी ज्ञान चाहिए। सुपाच्य व स्वादपूर्ण भोजन बनाने के लिए पाककला का ज्ञान चाहिए। गायन के लिए गायन कला का ज्ञान चाहिए। चित्र बनाने के लिए चित्रकला का ज्ञान चाहिए। भवन बनाने के लिए वास्तुकला का ज्ञान चाहिए। सुई से लेकर हवाई जहाज तक, कंप्यूटर से लेकर अंतरिक्ष यान तक, घड़ा से लेकर घड़ी तक, आविष्कार में, सृजन में ज्ञान की परम आवश्यकता है। हर घड़ी, हर पल, प्रत्येक स्थान पर ज्ञान की परम आवश्यकता है। अतः ज्ञानार्जन का प्रयास व्यक्ति का मूलभूत कर्तव्य है। मनुष्य का जीवन ज्ञानमय है। काम छोटा हो या बड़ा हर बात के होने के लिए ज्ञान चाहिए। 

जन्म से लेकर अंत काल तक मनुष्य को केवल ज्ञान ही संचालित करता है। मात्रा के आधार पर अल्प, मध्यम और उन्नत - तीन प्रकार का ज्ञान होता है। मनुष्य जन्मजात ज्ञानी जीव है। वह इसलिए भी क्योंकि मनुष्य जल्दी सीख लेता है। मनुष्य बुद्धि प्रधान है। इसलिए मनुष्य के लिए ज्ञान बुनियादी आवश्यकता है। ज्ञान बल आज के समय का उत्तम संसाधन है।

माता के द्वारा ही हमें बचपन में संसार का ज्ञान मिलता है। सीढ़ी चढ़ते समय भी ज्ञान चाहिए। सीढ़ी से उतरते समय भी ज्ञान चाहिए, नहीं तो गिरने का डर रहता है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य का पतन हो जाता है। ज्ञान के अभाव होते ही मनुष्य विपत्तियों से घिर जाता है। इसलिए हमारा कत्तर्व्य है कि प्रत्येक दिन विशिष्ट विषयों का अध्ययन करके ज्ञान और समझ को बढ़ाया जाय, बुद्धि को उन्नत बनाया जाय। ज्ञान की बढ़ोत्तरी से ही मनुष्य के भीतर समझदारी बढ़ती है। ज्ञान की बढ़ोत्तरी ही वास्तविक प्रगति है। मानसिक प्रगति ही सभी अन्य प्रगति का आधार है।

व्यावहारिक एवं विशिष्ट ज्ञान का अर्जन करना पड़ता है। इसके लिए परिश्रम की आवश्यकता रहती है। अभ्यास के द्वारा ही ज्ञान हमारे अंदर प्रवेश करता है और ज्ञान के प्रति अटूट निष्ठा के प्रभाव से सतत बना रहता है। ज्ञान की उपलब्धता ही मनुष्य के व्यक्तित्व को गरिमा और पूर्णता प्रदान करती है। पद या विशिष्ट गुण आने पर मनुष्य को अपने ज्ञान का उपयोग सर्वहित करने के लिए विवेकवान होने की आवश्यकता पड़ती है। चरित्र शुद्ध होने पर ज्ञान का असर जीवन पर अविलम्ब पड़ता है। चरित्र में भ्रष्टता से, आलस्य और प्रमाद से, कुविचारों के दुराग्रह से एवं बुरी आदतें ज्ञानार्जन में बाधा पहुँचाती हैं।

अधिक मात्रा में ज्ञान प्राप्त करने का अभ्यास करने के लिए ज्ञान के प्रति निष्ठा होनी चाहिए। अपने मन-मस्तिष्क को खुले रखकर ज्ञान का संग्रहण करना चाहिए। मनोविज्ञान, समाज, राष्ट्र, राजनीति, अर्थतंत्र के बारे में अधिकाधिक ज्ञान रखने से व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन उन्नत बनता है।  हमारे पास जो कुछ भी अच्छा है, उसके पीछे ज्ञान का ही बल है। प्रत्येक व्यक्ति स्वतः ही ज्ञानी है। 

शिक्षा प्राप्त करना, पढ़ना-लिखना दुनिया भर में अनिवार्य किया गया है। शिक्षा, ज्ञान आदि अर्जित करना हमारा मौलिक अधिकार है और कर्तव्य है। वास्तव में मनुष्य का संबंध ज्ञान से है। ज्ञान ही मनुष्य का सबसे बड़ा वैभव और सम्पदा है। दुनिया को ज्ञान सिखाने वाले लाखों महापुरुष हुए हैं। दुनियाभर में ज्ञान का बोध कराने वाली अरबों पुस्तकें हैं। कुछ पुस्तकें तो सैकड़ों वर्ष पुराने हैं तो कुछ पुस्तकें सैकड़ों पन्नों की हैं। एक मनुष्य का ज्ञान दूसरे मनुष्य के काम आता है। एक मनुष्य का अर्जित ज्ञान दूसरे के लिए बहुमूल्य संपदा है। पुस्तकों के द्वारा ही ज्ञान अनंत काल तक संग्रहित रहता है। 

आज के समय की सबसे बड़ी विपदा है कि हम पढ़ते नहीं है। पता नहीं हमें पढ़ने-लिखने से क्या दुश्मनी है। गैर-जरूरी कार्यों को स्थगित करके हमें कुछ मिनट, कुछ घंटे अवश्य पढ़ने चाहिए। आइए, समय का सर्वोत्तम ढंग से सदुपयोग करें। 

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(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।) 

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