दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । यह क्रोध मुक्त क्षेत्र है
सुबह फेसबुक खोला तो किसी सज्जन द्वारा एक पोस्टर साझा किया हुआ मिला। उस चित्र में लिखे संदेश ने मेरे मन-मस्तिष्क को क्रोध के बारे में पुनः सोचने-विचारने के लिए विवश किया। उस पर लिखा था - यह क्रोध मुक्त क्षेत्र है। इस संदेश को मनन करते-करते क्रोध के बारे में अपनी समझ का पुनः अवलोकन किया। क्रोध के बारे में यह संदेश हमारे किस निश्चित स्थान के लिए है? यह एक महान प्रश्न है। आइए, इस महत्वपूर्ण विषय पर चिंतन करते हैं। क्रोध करने से बनता हुआ काम बिगड़ जाता है। क्रोध से कुछ भी भला नहीं होता।
क्रोध हमेशा हानिकारक ही होता है। क्रोध दोनों को ही जलाता है क्रोध करने वाले को तथा जिन पर क्रोध किया जाय उसको भी। क्रोध एक ज्वलनशील पदार्थ है। क्रोध मन की गंदगी है। क्रोध शैतानों का बल है। क्रोध विध्वंसक है। क्रोध एक उत्पाती बैल है। क्रोध मन का बिगड़ा स्वर है। मन में जो अग्नि तत्व है उसी का नाम क्रोध है। आग की मात्रा थोड़ी हो या अधिक वह जलाएगी ही। अग्नि के थोड़े ही ताप का ही महत्व है।
जैसे शरीर में ताप रहता ही है, ऐसे ही मन में क्रोध का ताप अवश्य ही रहता है। इस ताप को बढ़ाना या कम करना हमारे वश में ही है। जैसे रेडियो के बटन को घुमा कर आवाज को कम या अधिक कर सकते हैं, वैसे ही बुद्धि के बटन को घुमा कर क्रोध का नियंत्रण कर सकते हैं।
क्रोध क्यों किया जाता है? क्रोध करने का मुख्य कारण होता है, अपने समक्ष व्यक्ति के मन में भय उत्पन्न करना। डराने के लिए क्रोध का सहारा लिया जाता है। क्रोध भय उत्पन्न करता है। क्रोध किस पर किया जाता है? क्रोध उस पर किया जाता है जो कमजोर होता है। यह बात सबको मालूम रहती है कि अपने से अधिक बलवान व्यक्ति पर क्रोध करना भयंकर हानिकारक साबित होता है। क्रोध कब आता है? जब व्यक्ति के हृदय में प्रेम का जल सूख जाता है तो क्रोध करना नहीं पड़ता बल्कि उसके मन में क्रोध स्वतः उत्पन्न हो जाता है।
क्रोध कौन लाता है? क्रोध को बार-बार हमारे समक्ष लाता है हमारा अभ्यास। मनुष्य को क्रोध करने का अनंत अभ्यास है। हम रोज ही जाने-अनजाने में क्रोध करते हैं। कुछ क्रोध मन में ही दब जाता है और दबा रह जाता है। कुछ क्रोध को हम व्यक्त कर देते हैं। यह सिद्धांत की बात है कि हम वही करेंगे, जिसका हमें अभ्यास है।
क्रोध क्यों आता है? जब हम स्वयं को किसी भी रूप में बड़ा मानते हैं तो हम क्रोध करने से कभी नहीं बच पाएँगे। यदि हम स्वयं को पिता मानते हैं तो बच्चों पर क्रोध करेंगे ही। यदि हम अपने को कंपनी का स्वामी मानते हैं तो कर्मचारियों पर क्रोध करेंगे ही। जो कोई भी स्वयं को किसी भी रूप में बड़ा मानता है, समझता है, या समझा हुआ है, माना हुआ है वह केवल और केवल क्रोध करने की ही पात्रता रखता है।
क्रोध कहाँ से मिलता है? क्रोध हमें विरासत से मिलता है। हमने अपने माता-पिता को क्रोध करते हुए देखा है इसलिए हमारे मन में क्रोध स्वतः ही आता है। हम अपने समाज में अनेक लोगों को क्रोध करते हुए देखे हुए हैं तो हम भी उसी की पुनरावृत्ति करते हैं। मनुष्य नकल करने में माहिर जानवर है। क्या क्रोध करना चाहिए? मनुष्य को उस समय नैसर्गिक रूप से भयंकर क्रोध करना चाहिए जब उसे अपने शरीर और जान का खतरा हो। क्रोध को स्वयं के जीवन रक्षक के रूप में उपयोग में लाना है न कि किसी के जीवन को खतरे में डालने के लिए।
तो फिर क्रोध पर विजय पाने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? आप अपने हृदय की गहराइयों में बैठे दिव्य जीव को समझाइए कि वह वास्तव में अपने लिए क्रोध विजय चाहता है तो वह स्वयं को सबसे कमजोर माने, दीनहीन माने, अज्ञानी माने, पतित, निर्धन, निर्बल, असहाय माने और अपने मन के प्रवेश द्वारा पर बड़े-बड़े अक्षरों पर यह घोषणा लिख दे – यह क्रोध मुक्त क्षेत्र है।
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(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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