दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । काना-फूँसी की आदत को त्यागिए


आप कुछ मित्रों के साथ किसी खुले स्थान पर बैठे हैं। आप लोग किसी काम की बात पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। इतने में कि उनमें से दो व्यक्ति कुछ दूर हट जाते हैं। वे कुछ दूरी पर जाकर गुपचुप बातें करने लगते हैं। आप उनकी बातों को सुन नहीं पा रहे हैं। आपके मन में एक जिज्ञासा है कि वे आखिर क्या बात कर रहे होंगे। आपके हृदय में शंका उत्पन्न होती है। आपको लगता है कि हो न हो वे आपके ही बारे में चर्चा कर रहे होंगे। वे जरूर आपकी बुराई कर रहे होंगे। यह विचारते आपका हृदय कह उठता है – अवश्य ही ये लोग मेरे विषय में टीका-टिप्पणी कर रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो वे दूर हटकर बात क्यों करते।

यह प्रवृत्ति औसत रूप से साधारण लोगों में पाई ही जाती है। काना-फूँसी करना एक खराब प्रवृत्ति है। उससे भी अधिक बुरी आदत है काना-फूँसी सुनना। यह दोनों ही प्रवृत्ति व्यवहार के दोष हैं। ये दोनों ही आदतें दुर्बल मन वाले व्यक्ति पाई जाती हैं। जब आप समाज में व्यवहार करते हैं तो इन दोनों बुरी आदतों के प्रति सजग रहिए। जब आप घर से बाहर हैं और आप किसी विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति वाले कार्यों में लगे हुए हैं तो इस प्रकार के व्यवहार करना अच्छे लोगों की संगति से वंचित कर देगा। अच्छे लोग कमजोर चित्त वाले व्यक्ति के साथ दूर का संबंध रखते हैं। 

गुपचुप बातें करने वाले व्यक्तियों की ओर संदेह से देखते हैं तो इससे आपकी ही हानि है। जब आप ऐसा सोचते हैं कि लोग आपकी बुराई कर रहे हैं तो इससे आपके भीतर एक नई बुराई चिपक जाती है। आप ऐसा क्यों समझते हैं कि आपका व्यवहार निंदनीय है। कोई मेरी निंदा कर रहा है, ऐसे विचार मन में आना ही नहीं चाहिए। ऐसे विचार आने से हम स्वयं की दृष्टि में अपने मान-सम्मान को गिरा डालते हैं। युवाओं को इस वृत्ति पर विशेष गौर करना चाहिए।

सार्वजनिक स्थानों पर या लोक व्यवहार करते समय काना-फूँसी करना, फुसफुसाना, कान के पास जाकर गोपनीय बातें करना, अत्यंत धीमी बात करना आदि व्यवहार शिष्ट आचरण के अंतर्गत नहीं आते। यदि आपके भीतर ऐसी कोई वृत्ति है तो उसकी समीक्षा कीजिए। संकल्प कीजिए कि इस तरह के व्यवहार के प्रति आगे से सावधान रहेंगे। इन निम्न कोटि की आदतों को छोड़ने में ही हमारी भलाई है। काना-फूँसी सुनने की आदत के कारण ही बुराइयों को हमारे भीतर प्रवेश करने का अवसर मिलता है। हमारे भीतर जो भी बुराइयाँ प्रवेश करती हैं, वह अक्सर कानों के रास्ते ही प्रवेश करती हैं। आपकी मित्र मंडली में कोई गुपचुप बातें करते दिखें तो तुरंत सावधान हो जाइए, वहाँ से दूर हट जाइए, उसमें भाग न लीजिए और न हीं उनकी बातों को सुनने में कोई दिलचस्पी दिखाइए। निंदा सुनना और निंदा करना दोनों ही उचित नहीं है।

वास्तव में, दूसरों को अपने प्रति ईर्ष्यालु निरूपित करना, अकारण ही लोगों को अपने आलोचक और विरोधी माने बैठना, यह सब हमारे स्वयं में बढ़ती आंतरिक दुर्बलता की ही निशानी हैं। कोई क्या कहता है, मेरी प्रशंसा कोई क्यों नहीं करता, लोग मेरी किसी बात की निंदा करते हैं, यह जानने की वृत्ति एक भले सज्जन व्यक्ति के भीतर की मानसिक दुर्बलता को ही प्रकट करती है। वास्तव में, कोई हमारी चुगली नहीं करता। कोई हमारे प्रति ईर्ष्या नहीं रखता। हम स्वयं ही ऐसे बुरे खयाल अपने में पाले बैठे रहते हैं। 

अपने मन में यह सहज ही विश्वास रखिए कि सब आपके मित्र हैं, शुभचिंतक हैं और हितैषी हैं। कोई कुछ भी समझे आप अपने शिष्ट व्यवहार से कभी दोष आने न दीजिए। मित्र भाव ही रखिए। मित्र भाव में बड़ी शक्ति है। मित्र भाव रखने में कभी भी कोई हानि नहीं है बल्कि यह भाव मन में शांति का विस्तार ही करता है। मित्र भाव रखे बिना आपका सामाजिक संबंध मधुर नहीं बनेगा। मित्र भाव सामाजिक संबंधों के सुधार में कारगर वृत्ति है। 


(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)

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Photo: https://www.kafaltree.com/goody-goody-days-part-7/


Comments

Arun Arora said…
Very relevant theme and well articulated.
Criticism impacts both the given and receiver.
Whispering to another person, while in a group is a bad habit, and reflects poorly on your character.
Arun Arora