दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । शब्दों की गुप्त शक्तियों को समझिए





भाषा के बिना मनुष्य का काम एक पल भी नहीं चलता। हजारों भाषाएँ एवं बोलियाँ हैं। मनुष्यओं ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए भाषाओं का सहारा लिया। आज भाषा की समृद्धि मनुष्य जाति की समृद्धि का पैमाना बन चुका है। जो व्यक्ति भाषा में पारंगत है उसकी समाज में बड़ी प्रतिष्ठा है। जो कई भाषाओं के जानकार हैं, उनकी तो अलग ही मान-मर्यादा है। 

एक-एक शब्द मिलने पर ही भाषा की समृद्धि होती है। भावनाओं को कहने के लिए हमें शब्दों का भंडार चाहिए। शब्दों के अभाव में भावनाओं की अभिव्यक्ति कमजोर पड़ जाती है। जिनमें अभिव्यक्ति की कुशलता है ऐसे लोग समर्थ वक्ता, कवि, लेखक, वाचक, गायक आदि बन जाते हैं। 

हमारे शब्द ही हमारे प्रतिनिधि हैं। हम जैसा शब्द बोलते और लिखते हैं, लोग उन्हें अपनी भावनाओं के साथ जोड़ महसूस करते हैं और समझते हैं। पत्रों में लिखे कुछ शब्द ही दूर देशों में व्यक्ति की भावनाओं का उद्घाटन कर देते हैं। शब्दों की गुप्त ताकत को वास्तव में बहुत कम लोग समझ पाते हैं। विद्यार्थियों को विशेषकर शब्दों की असीमित शक्तियों का बोध रखना चाहिए। 

एक कहावत प्रचलित है कि तलवार के घाव तो जल्दी भर जाते हैं पर जुबान के घाव को भरने में ज्यादा देर लगती है। रोचक बात यह है कि तलवार से आघात पहुँचाने वाले व्यक्ति के लिए कानून में सजा का प्रावधान है लेकिन जुबान से दिल में घाव करने वालों के लिए वैसा कोई दंड नहीं है। इसीलिए हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम मन या भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले शब्दों के प्रति सजग रहें। 

शब्द बुरे हों या अच्छे, कैसे भी हों वे अवश्य ही असर डालते हैं। जब हम किसी की गरिमा के प्रतिकूल कोई शब्द बोल पड़ते हैं तो वे शब्द व्यक्ति के अंतःकरण में पहुँच कर उथल-पुथल मचाते है और दर्द उत्पन्न करते हैं। इसके विपरीत मधुर वाक्य बोलकर अजनबियों को भी अपना बनाया जा सकता है। मधुर वाणी बोलकर हम लोगों में उत्साह का संचार कर सकते हैं। अच्छा बोलकर हम बिगड़ी बातों को भी सुधार सकते हैं। हमें निरंतर यह प्रयासरत रहना चाहिए कि हम शब्दों के धनी बनें। शब्दों के धनी बनकर ही हम अन्य सभी प्रकार की सम्पन्नता का नीव डाल सकते हैं।

हमारी भावनाएँ शब्दों पर शासन करती हैं। जैसी हमारी भावना होगी उस समय वैसे शब्द हमें बोलना पड़ता है। अर्थात् शब्दों में संयम लाने के लिए पहले हमें अपनी भावनाओं में संयम लाने होंगे। यहाँ तक तो ठीक है लेकिन भावनाओं को कौन संचालित करता है। भावनाओं को संचालित करती हैं हमारी धारणाएँ, मान्यताएँ, हमारा विश्वास और यादें। चूँकि यह मिश्रित रूप में हमारे भीतर बहुत मात्रा में रहती हैं, इसलिए कब कौन-सी बात निकल जाय इसका पता नहीं लगता। इसी कारण ही वाणी पर हमारा नियंत्रण रख पाना कठिन होता है। वाणी में संयम लाने के लिए हमें हर समय सजग रहना होगा और भावनाओं के प्रति सचेत रहना होगा।

शब्दों को बहुत संभाल कर खर्च करना चाहिए। शब्द, वाणी बहुत ही मूल्यवान संपदा है। जैसे हमारा प्रयास होता है कि एक-एक रुपये का सदुपयोग हो, उसी प्रकार ही हमें एक-एक शब्द की उपयोगिता पर ध्यान देना चाहिए। अनेक कार्य हैं जो शब्दों के द्वारा ही चलते हैं – जैसे समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन, समाचार चैनल, पुस्तक 
प्रकाशन आदि। संचार के जितने भी माध्यम हैं, उनमें शब्द साधकों की बड़ी माँग है। 

संक्षेप में, हमें शब्दों का संग्रह बढ़ाना और साथ ही साथ भावनाओं में समृद्धि लानी है। अपनी वाणी पर संयम हो इसका बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है। शब्दों का धनी बनकर और अपनी कही गई बातों पर खरा उतर कर दूसरों को प्रसन्नता दी जा सकती है। मधुर एवं शुभ वाणी बड़े-बड़े मानसिक घावों को भर देती है। सार्थक शब्दों के द्वारा दुःखों को कम किया जा सकता है। जिस प्रकार हमारे मन की स्थिति होगी, वैसे ही बातें हमारी जुबान से निकलेंगी।

मन को अच्छे विचारों से शुभ और सुंदर बनाकर वाणी में मधुरता लानी चाहिए। हमें शब्दों की साधना करनी चाहिए। शब्दों की साधना के लिए प्रत्येक दिन उच्च कोटि के साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। जीवन में सफलता पाने के लिए भाषा में विशेषता प्राप्त करनी चाहिए। अच्छी अभिव्यक्ति के लिए शब्दों का खजाना चाहिए।

(प्रकाशन की शर्तः इस लेख को किसी अखबार या वेब माध्यमों द्वारा प्रकाशित करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। प्रकाशन का अनुरोध rusenk@indiacsr.in पर भेजा जा सकता है।)

चित्र स्त्रोतः https://cartoonmovement.com/cartoon/power-words

इस आलेख को अंग्रेजी भाषा में पढ़िएः DAILY REFLECTIONS BY RUSEN KUMAR : LET’S US APPRECIATE THE SECRET POWER OF WORDS

Comments