दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । दीया बुझने पर भी उजाला रहे





रोज एक नया दिन आता है। सुबह होती है और कुछ घंटों के बाद सूर्यास्त हो जाता है। लेकिन यह दिन सुबह और शाम के अंतराल में आशा की नई किरणें बिखेर जाता है। ऐसे ही हमारे जीवन का हाल है। जन्म होता है, किसी दिन मृत्यु आ जाती है, लेकिन बीच में हमारे लिए जीने और करने के लिए बहुत समय रहता है। आशा की किरणें ही जीवन का विस्तार हैं। कोरोना महामारी में हमारी सारी उन्नति और तकनीकी जटिलता मृत्यु के सामने विवश है। वह जवान था पर उसकी जवानी मृत्यु के सामने विवश थी। वह चला गया लेकिन सब मिलकर भी उसे रोक न सके। किसी के रोकने से कोई नहीं रुकता, प्रकृति का नियम बदलता नहीं है।

मृत्यु की शक्ति सार्वभौमिक है अर्थात यह चाहे कोई ऊँचा हो या नीचा हो, धनवान हो या दरिद्र हो सभी को घात करती है। वैसे तो प्रकृति कभी नहीं चाहती कि समय पूर्व किसी की मृत्यु हो। प्रकृति जीवन की रक्षक है। चाहे जो भी हो हमारे लिए जीवन का अंत एक अच्छा अंत होना चाहिए। वास्तव में मृत्यु एक कर्ज है जिसे हम सभी को चुकाना है। सब कहते हैं मानवीय पाप मृत्यु का स्त्रोत है। असली पतन जो मनुष्य को पकड़ी है वह देह की नहीं पर नैतिक और आत्मिक है। 

मृत्यु का अचानक आ जाना, यह अनजाना-सा रहस्य, डराता है। इस भय के द्वारा मनुष्य ठीक से जी नहीं पाता है। यह आश्चर्य की बात है कि मृत्यु की प्रत्यक्ष और अनिवार्य वास्तविकता को जानने के बाद भी हम अपने नश्वरता को स्वीकार करना नहीं चाहते। कुछ लोग जवानी में, दुर्घटना से या बीमारी से परलोक सिधार जाते हैं। मृत्यु कोई दुर्घटना नहीं बल्कि एक सुनियोजित घटनाक्रम है। जब दुर्घटना घटी तो हमारी गलतियाँ वहां मौजूद थीं। हमारे जीवन के लिए जिस तरह हम जिम्मेदार रहते हैं, वैसे ही हम अपनी मृत्यु के लिए भी जिम्मेदार होंगे। कोई हमें नहीं मारता बल्कि हमारी मृत्यु ही हमें मारती है। 

हमारे अपनों की मृत्यु विचलित करती है। लेकिन दूसरी ओर जो अपरिचित हैं उनका होना या न होना हमारे लिए किसी मायने के नहीं हैं। जो हमारे लगाव की परिधि से बाहर हैं वे दुःख के कारण नहीं बनेंगे। स्वार्थ की अब पूर्ति नहीं होगी, इसी का नाम ही शोक है। हमारे प्रिय जन की यादें हमें प्रेरणा अवश्य देती हैं। 

हमारा जीवन मृत्यु की परिधि से घिरा है। मृत्यु अनेक कारणों से आती है लेकिन जीवन का प्रारंभ एक ही बार होता है। सभी जानते हैं कि मरे को जीवित नहीं किया जा सकता। हम मृत्यु को पराजित नहीं कर सकते। वैसे तो हमारा सारा जीवन मृत्यु की तैयारी का होता है। मृत्यु जीवन का मुकुट है, जिसे हर किसी को पहनना है। हमें ऐसे जीना है कि हम जाएँ तो लोग हमारी कमी को महसूस करें। हमें ऐसा मरना है कि लोग कहें कि इसका जीवन कितना उपयोगी और सार्थक था। दीया बुझ जाने पर भी उजाला बचे रहना चाहिए। 

जीवन को उसकी आयु से नहीं पर उसकी परिपूर्णता से मापा जाना चाहिए। हमारा कार्य पूरा होने के बाद प्रकृति हमें उठा ले जाती है। कई मनुष्य मिलकर हमारे जीवन की रक्षा करते हुए देखे जाते हैं। हमारा जीवन एक साझा वस्तु है। इसीलिए अपनों की मृत्यु का दुःख है। सब कहते हैं, वह समय से पहले चला गया। किसको मनुष्य के मरने के सही समय की जानकारी है? प्रकृति हमें मुश्किलों से बचाकर अपने पास ले जाती है। 

हमारा जीवन अनंत सृजन का स्त्रोत है। वैसे तो मनुष्य हजारों बार मृत्यु को पराजित करके ही जीवित रहता है। आशा की किरणें मृत्यु को धकेल कर बाहर कर देती हैं। एक बूढ़ा जब मृत्यु शय्या पर था तो उसने अपने तीन पुत्रों को झगड़ते सुना जो अंतिम संस्कार के खर्चे को लेकर विवाद कर रहे थे। बूढ़े व्यक्ति ने उनकी बातें सुनी और उठ खड़ा हुआ और बच्चों को बुदबुदाया, विवाद बंद कीजिए, मेरे लिए पैंट ले आओ मैं उसे पहनकर कब्रिस्तान चला जाऊँगा। मृत्यु इतना आकर्षक है कि मनुष्य अंत में कब्रिस्तान ही जाना चाहता है। उसके पहले अधिक जीना ही हमारा एक मात्र कर्तव्य होना चाहिए। 

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