दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । हमारा मुख्य कर्तव्य है - दुःख न बढ़ाना
कामना यानी चाहत, इच्छा आदि मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है। हमारी चाहतें ही जीवन के पहियों को घुमाती है। कामनाओं के पहियों के सहारे ही जीवन की राह मापी जाती है। मनुष्य में अनंत कामनाएँ पैदा करने की क्षमता हैं। एक कामना की पूर्ति होने पर दूसरी कामनाएँ जन्म लेती हैं। कामनाएँ ही दुःख और सुख के कारण बनती हैं। कौन-सी कामना हानि कराती हैं और दुःख लाती तथा कौन सी कामना उन्नति कराती है एवं सुख देती, इसका बोध होना आवश्यक है।
मूल रूप में मनुष्य केवल दो ही चीजें चाहता है, पहला - दुःख न मिले और दूसरा - आनंद या खुशी बढ़े। मनुष्य जो भी अपने लिए कर्म करता है सुख और दुःख को केंद्र में रख कर ही करता है। बाकी सभी बातें इन्हीं दो तथ्यों के विस्तार से उत्पन्न होती हैं। यही दो बातें अनेक रूपों में हमारे सामने जीवन भर आगे-पीछे उपस्थित होते रहती हैं। जैसे – हानि न हो, केवल लाभ ही हो। अपमान न हो, मान बढ़े। डर न हो, शांति मिले। विफलता न हो, सफलता मिले। अंधेरा न हो, उजाला बढ़े। असुविधा न हो, सुविधा बढ़े। घृणा कम हो, प्रेम बढ़े। क्रूरता मिटे, सहृदयता बढ़े। अकाल न पड़े, हरियाली बढ़े। विपदा न आए, सम्पन्नता बढ़े। बीमारी हटे, स्वास्थ्य बढ़े।
हमारा पूरा जीवन सुख की वृद्धि और दुःख की निवृत्ति करने में ही बीतते रहता है। दुःख और सुख जीवन रूपी सिक्के के दो पहलू है। सुख ऊपर की तरफ हो तो दुःख अपने आप नीचे की ओर चला जाता है। ऐसे ही दुःख ऊपर हुआ तो सुख नीचे दब जाएगा। एक का अभाव ही दूसरे का होना है। दुःख का अभाव ही सुख है। अनेक सुखों का संग्रह ही आनंद है।
सचमुच में यह चिंतन का विषय है कि आखिर ऐसा क्या किया जाय, जिससे दुःख न बढ़े, लेकिन सुख बढ़े। यदि हम सुख चाहते हैं तो सुख बढ़ाने वाले कार्य करने ही होंगे। यह कोई नहीं चाहेगा कि दुःख बढ़े लेकिन फिर भी अधिकांश मामलों में सबका अनुभव यही है कि कार्यों के परिणाम में दुःख ही मिलते हैं। वास्तव में, कामना की गुणवत्ता से ही जीवन का सुख, दुःख तय होते हैं। हमारी कामनाएँ कम होंगी - संतोष करने से।
हमारा जीवन तभी उपयोगी बनेगा जब हमारी कामनाएँ सार्थक होंगी। कामनाओं का समर्थ आधार होना चाहिए। अपना तथा दूसरों का दुःख न बढ़ाना ही हम मनुष्यों का मुख्य कर्तव्य है। हमारे किसी कार्य से दुःख न बढ़े इसका विचार तो हर किसी को करना चाहिए। कामना की पूर्ति नहीं होने से ही दुःख होता है और कामना में बाधा डालने वालों के प्रति रोष व द्वेष होता है। द्वेष दुःखकारक वस्तु है।
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