दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार। 81 प्रकार की हिंसा न करना अहिंसा है
भारत भूमि को अनेक महापुरुषों ने अपने दिव्य ज्ञान से अभिसिंचित किया है। मनुष्य जाति पर अनेक महापुरुषों का उपकार है। बीते 25 अप्रैल को हमने भगवान महावीर की जयंती मनाई। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार वर्ष पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व) हुआ। भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें गुरु थे, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है।
तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को उच्चतम नैतिक गुण कहा है। दुनिया को पंचशील सिद्धांत - अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य का उपहार दिए। भगवान महावीर ने मानव जाति पर महान उपकार किए हैं। भगवान महावीर की अहिंसा के बारे में सूक्ष्म व्याख्या दुर्लभ और अनमोल है। मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति से लेकर दृश्य-अदृश्य सूक्ष्म जीवों, पशु-पक्षी आदि के प्रति मित्रता और अहिंसक विचारों के साथ समन्वय करने की समझाइश दी। वैसे तो हिंसा-अहिंसा के बारे में रोज ही कुछ न कुछ पढ़ने की सामग्री मिल जाती है।
महावीर, बुद्ध, कृष्ण, वेद, पुराण, उपनिषद, कुरान, बाइबल, गुरुग्रंथ साहिब - सभी महापुरुषों एवं ग्रंथों द्वारा हिंसा की बुराई के बारे में मनुष्य जाति को सचेत किया गया है। आज के समाज में शिक्षा का विस्तार होने पर लोगों में हिंसा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। हिंसा-अहिंसा व्यापक अर्थों वाले शब्द हैं। आइए थोड़ा विचार करें और हिंसा-अहिंसा के मर्म को समझने का प्रयास करें। विद्यालयों में बच्चों को अहिंसा के बारे में शिक्षा अवश्य दी जाती है।
हिंसा का अभाव अहिंसा है। अहिंसा का संबंध दुःख न देने से है। अहिंसा का अर्थ अत्यंत गहन है। मन, वाणी और शरीर से कभी किसी को रंचमात्र भी दुःख न देने का नाम अहिंसा है।
कर्ता भेद से हिंसा तीन प्रकार की होती है – कृत यानी स्वयं हिंसा करना, कारित यानी किसी से हिंसा करवाना और अनुमोदित यानी हिंसा का अनुमोदन अथवा समर्थन आदि करना। यह तीन प्रकार की हिंसा तीन भावों से उत्पन्न होती हैं – क्रोध से, लोभ से और मोह से।
आशय यह है कि क्रोध से भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है। लोभ से भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है। इसी ही प्रकार से मोह से भी कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा होती है। इस तरह से नौ प्रकार की हिंसा हो जाती है।
इन नौ प्रकार की हिंसा में तीन मात्राएँ – अल्प, मध्य और अधिक मात्रा। किसी को थोड़ा दुःख देना अल्प मात्रा में हिंसा है। मध्य मात्रा में दुःख देना मध्य मात्रा में हिंसा है। बहुत अधिक चोट करना, घायल कर देना अथवा पूरी तरह खत्म कर देना आदि अधिक मात्रा में हिंसा है। इस तरह अल्प, मध्य और अधिक मात्रा के भेद से हिंसा सत्ताईस प्रकार की हो जाती है।
यह सत्ताईस प्रकार की हिंसा तीन कारणों से होती है – मन से, वाणी से तथा शरीर से। इस प्रकार गणना करने पर हिंसा इक्यासी प्रकार की हो जाती है। इनमें से किसी भी प्रकार की हिंसा न करने का नाम अहिंसा है। यह अहिंसा भी चार प्रकार की होती है – देशगत, कालगत, समयगत और व्यक्तिगत। अमुक तीर्थ में,अमुक मंदिर में, अमुक स्थान में किसी को दुःख नहीं देना – यह देशगत अहिंसा है। अमावस्या, पूर्णिमा, क्रिस्मस, गुरु पर्व या किसी विशेष पर्वों के दिन दुःख नहीं देना है ऐसी भावना रखना - यह कालगत अहिंसा है।
महापुरुषों के मिलने पर, संतानों के जन्मदिन पर, प्रिय जनों की पुण्यतिथि पर किसी को दुःख नहीं देना है ऐसी भावना रखना – यह समयगत अहिंसा है। गाय, बकरी, हिरण, मोर असहाय प्राणियों आदि को तथा आदरणीजनों और अपने से छोटे जैसे - गुरुजन, माता-पिता, परिजन, बालक-बालिका आदि को दुःख नहीं देना है ऐसा विचार रखना – यह व्यक्तिगत अहिंसा है।
किसी भी देश, काल आदि में क्रोध, लोभ और मोह पूर्वक मन, वाणी और शरीर से दुःख न देने की भावना सार्वभौम अहिंसा है। आज के समय में हमें वाणी की हिंसा के बारे में अधिक सचेत रहने की आवश्यकता है। दूसरों को दुख देने से बड़ी हिंसा कोई नहीं। अपमानजनक व्यवहार, कटु वाक्य बोलने से अधिक हिंसा होती है। हिंसा से ही विपत्ति आती है। हिंसा का अनुमोदन करना भी हिंसा है।
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