दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । मान-अपमान हमारे दो दुश्मन




मान, यश, प्रसिद्धि मिलने पर खुशी होती है। अपमान मिलने पर दुःख होता है। न मान टिकता है और न हीं अपमान रहता है। कभी अपमान मिले तो दुःखी नहीं होना चाहिए और मान मिलने पर अभिमान नहीं पालना चाहिए। मान-अपमान आने-जाने वाली बातें हैं। दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। हमें अपने आप को कुछ इस तरह से तैयार करना चाहिए कि मनचाही बात नहीं होने पर हममें नाराजगी नहीं आएगी। मान-बड़ाई की अपेक्षा हमारे कार्य में बाधा उत्पन्न करती है। लेकिन हमें वही कार्य करने चाहिए जिससे मान-सम्मान मिलता है। अपमान-अपयश से लिपटे हुए कार्यों को छोड़ देना चाहिए। 

सामाजिक और राष्ट्र की व्यवस्था को गौर से देखेंगे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि किन कार्यों को करने से प्रतिष्ठा बढ़ती है। जिन कार्यों को करने का निषेध किया गया है वही अपमान पैदा करते हैं। अपमान मिलने पर अक्सर बदले की भावना पनपती है। अपमानित करने वालों के प्रति बदले की भावना नहीं रखनी चाहिए, बल्कि अपनी कमजोरियों और सुधार करने योग्य बातों में परिवर्तन लाना चाहिए। यह भी तथ्य है कि बार-बार अपमान मिलने से गरिमा घटती है। आत्मविश्वास डिग जाता है। मान-अपमान देने वाले कार्यों का भलिभांति भेद करने की योग्यता हमारे भीतर होनी चाहिए। 

सार्वजनिक हित और महत्व के कार्यों को संपादित करने में यश और प्रसिद्धि मिलती है। इसी तरह हानि या आघात पहुंचाने वाले कृत्य करने से अपयश और दंड मिलता है। जीवन में कार्य का चुनाव करते समय यशपूर्ण कार्य का चुनाव करना चाहिए। यशवान लोगों से सम्पर्क रखना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऊंचे लक्ष्य और आदर्श जीवन शैली यश वृद्धि में सहायक होती है। हमें स्वयं भी लोगों की यश वृद्धि हो ऐसे कार्यों में सहयोग देना चाहिए। अपमान मिलने का अर्थ है हमारे भीतर कोई बड़ी भारी कमजोरी है। अपमान मिलने का यह भी अर्थ है कि हमें अपने भीतर काफी कुछ सुधार करने की आवश्यकता है।

मान-अपमान की भावना की उपेक्षा की जाए तभी ऊँची सफलता मिल सकती है। आपने अनुभव किया होगा कि कुछ लोगों को उनके मान-अपमान का फर्क नहीं पड़ता है। 

शास्त्रीय अर्थों में - मान-सम्मान चाहते हैं, तो इसका सामान्य-सा अर्थ है कि हमारे भीतर अहंकार है। हम चाहते हैं कि लोग हमारी प्रशंसा करें। कोई प्रशंसा करता है तो हमें खुशी होती है। मान मिलने पर किसको संतुष्टि मिलती है- अहंकार को। हम नहीं चाहते कि लोग अपमान करें। जब कोई अपमान करता है तो हम आपा खो देते हैं। यह भी अहंकार का एक रूप ही है। मान को सहज स्वीकार कर लेतें हैं लेकिन अपमान पर घोर प्रतिकार करते हैं।

अपमान होने पर क्रोध आता है। किसको क्रोध आता है? क्रोध आता है अहंकार को। अपनी आलोचना सुनने पर स्वयं को अपमानित अनुभव करते हैं। वैसे तो जब कोई आलोचना करता है तो अपमान का अनुभव नहीं करना चाहिए, बल्कि उन बातों को सुधार करना चाहिए। किसी बात के लिए आज अपमान हुआ है तो कल किसी अच्छी बात के लिए मान भी मिलने की संभावना है। लोगों की धारणाएँ और व्यवहार बदलते रहते हैं।

जब कोई हमें हमारी बुराइयों के प्रति सचेत करता है तो भी हमें ऐसा लगता है कि वह हमारा अपमान करने के उद्देश्य से ऐसा कर रहा है। आप एक पेन और एक कोरा कागज लीजिए। उसमें लिखिए कि दुनिया में प्रमुख तौर पर कौन-कौन सी बुरी बातें इन दिनों प्रचलन में हैं। फिर उन दोषों को अपने भीतर खोजिए। आप पाएँगे कि उनमें से शत-प्रतिशत दोष आपके भीतर मौजूद हैं। 

यदि हम दूरबीन लेकर खुद का विश्लेषण करें तो हम पाएँगे कि हमारे में अच्छाई नामक वस्तु उपलब्ध ही नहीं, जिसकी कोई प्रशंसा करे। प्रशंसा करने योग्य बातें हमारे भीतर तभी आएगी जब हम इसका अभ्यास लंबे समय से करते चले आएँगे।

वास्तव में लोग झूठी प्रशंसा ही करते हैं मतलब निकालने के लिए। साधारण लोगों की प्रशंसा में मतलब छुपा रहता है। प्रशंसा करने के लिए हृदय की सरलता चाहिए, उदारता चाहिए, जो दुर्लभ है। मान मिलने पर पर खुश हो जाना और अपमान न सह पाना हमारे लिए चिंतनीय विषय होना चाहिए। 

मान एवं बड़ाई चाहना एक तरह की मानसिक दुर्बलता का परिचायक है। जिनमें लोभ होता है उनमें मान चाहने की भी तीव्र इच्छा होती है। जो लोग अपने जीवन में एक नई बुलंदी चाहते हैं, उन्हें यश-अपयश की चिंता न करते हुए अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। यह स्मरण रखने योग्य बात है कि मान और अपमान हमारे दो दुश्मन हैं। मान न देने वाले के प्रति और अपमान करने वाले दोनों ही तरह के लोगों के प्रति द्वेष बढ़ता है। कुल मिलाकर मान-अपमान मन का विकार है।

(रुसेन कुमार, उद्यमी, पत्रकार एवं  लेखक हैं। उनके चिंतन दैनिक अखबारों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।) 

(प्रकाशन की शर्तः इस लेख को किसी अखबार या वेब माध्यमों द्वारा प्रकाशित करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। प्रकाशन का अनुरोध rusenk@indiacsr.in पर भेजा जा सकता है।)

चित्र स्त्रोतः https://letterpile.com/religion/Psalm-150-Five-Reasons-to-Praise-God

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