दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । भाग्य एवं पुरुषार्थ के रहस्य
भाग्य का निर्माण शुभ कर्मों के सतत निष्पादन द्वारा ही होता है। अगर हम अच्छे एवं शुभ उद्देश्यों के लिए निरंतर मेहनत करेंगे तो हमारा भाग्य खुद-ब-खुद चमक उठेगा। भाग्य और कुछ नहीं बल्कि हमारे कर्मों का ही संग्रह है। धरती का प्रत्येक जीव अपने कर्मों के आधीन रहता है।
जैसे कार्य (पुरुषार्थ) किए जाएँगे, उसी के अनुरूप परिणाम (भाग्य) आएँगे। प्रकृति का एक महत्वपूर्ण कार्य है परिणाम उत्पन्न करना। प्रत्येक जीव को प्राकृतिक नियमों के अधीन रहकर उसे अपना कर्म अवश्य करना होता है। जीवन का सार यही है कि कर्म किया जाएँ, निरंतर प्रयास किए जाएँ। प्रत्येक कर्म का एक निश्चित प्रतिफल होता है। वैसे तो कर्म तथा कर्म का फल आना अलग-अलग क्रियाएँ।
प्रत्येक कार्य के होने के पीछे कोई विशिष्ट कारण छिपे रहते हैं। बिना कारण के प्रकृति में कुछ भी घटित नहीं होता। घटना के लिए कारण चाहिए। इसी तरह जिन विशेष परिस्थितियों को भाग्य कह दिया जाता है, इसका कारण हमारे पहले के कर्म (संचित कर्म) ही होते हैं। कर्म के अनेक रूप होते हैं, वैसे ही भाग्य के अनेक स्वरूप होते हैं।
जैसे-जैसे आज के कर्म होंगे, वे ही संग्रहित होकर भविष्य में हमारे भाग्य बन जाएँगे। आज हम जो शुभ कर्म कर रहे हैं, वह उद्यम है और कर्म फलों का आज जो आनंद मिल रहा है वह भाग्य कहलाता है। पिछले कर्म आज हमारे सामने भाग्य बनकर उदित हो रहे हैं। बचपन में हमारे माता-पिता हमारे भाग्य का निर्माण करते हैं और जब हम बड़े होकर शुभ कर्म करते हैं तो वह हमारे तथा आश्रितों के लिए भाग्य बन जाता है।
किसी के कर्म किसी और के लिए भाग्य है। मान लीजिए आप कर्मठ माता-पिता की संतान हैं तो यह आपका सौभाग्य है कि उनके अच्छे कर्मों के कारण आपका अच्छे तरीके से लालन-पालन हो रहा है। कुछ चीजें हमें बिना श्रम के भी प्राप्त हो जाती हैं। हमें कुछ श्रम किए बिना ही घर में पौष्टिक एवं स्वादिष्ट भोजन मिल जाता है। माता ने रसोई घर में श्रम किया और हमें परिणाम में गरमा गरम भोजन मिल गया। किसानों ने अथक परिश्रम करके अन्न उपजाए और हमें बिना श्रम किए अन्न मिल गया।
किसी ने बगीचे में वर्षों पहले फलों के पौधे लगाए, उन पौधों के मीठे फल हमें अल्प श्रम से ही प्राप्त हो रहे हैं। अनेक लोगों ने अनेक वर्षों के श्रम करके जो मार्ग बनाए हैं, उन पर चलना हम सबके लिए सरल हो गया है। दूसरों को सहूलियत देने के लिए दुनिया भर में करोड़ों लोग अपने श्रम का निष्पादन कर रहे हैं।
हमें कुछ भी मिल रहा है वह हमारा सौभाग्य है क्योंकि इनको बनाने में अनेक लोगों का सामूहिक योगदान है। आज हम जो कार्य और श्रम करेंगे कल वह श्रम किसी और के लिए भाग्य का निर्माण करेंगे। भाग्य का उलटा होता है दुर्भाग्य। पुरुषार्थ का विपरीत शब्द है आलस्य।
हमारी दुनिया पुरुषार्थों एवं पुरुषार्थी लोगों से भरी पड़ी है। पुरुषार्थों के बल पर ही शेष समाज का भाग्य बनता है। यदि हमें भाग्यशाली बनना है तो आज भरपूर श्रम करना होगा। लोकतंत्र में हमें सामूहिक कर्म करके सामूहिक भाग्य का निर्माण करना होता है।
मनुष्य आज जितना सौभाग्यशाली नजर आता है, उतना कभी नहीं रहा होगा। विज्ञान की प्रगति ने सबको सौभाग्यशाली होने का गौरव प्रदान किया है। थोड़े से श्रम से उन्नत चीजों का उपभोग करना सुलभ है। कर्मठता से ही भाग्य का सृजन होता है। बच्चे यदि खूब पढ़ाई करेंगे तो इसका आशय यह है कि वे अपने लिए गौरव एवं भाग्यशाली भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। आलस्य करने से विपदा आती है। युवा अपने समय का सदुपयोग करेंगे तो देश के जिम्मेदार नागरिक बनकर अनेक लोगों के लिए उन्नत भाग्य का निर्माण करेंगे।
ज्ञानियों ने यह सुझाया है कि मनुष्य को अपने शुभ कर्मों के द्वारा भाग्य का निर्माण करना चाहिए और फिर भाग्यशाली रहकर नित नए शुभ कर्मों को संपादित करना चाहिए। हमें भाग्यशाली होने के लिए उद्यमशीलता का मार्ग ही अपनाना चाहिए।
धन-संपदा, संपन्नता, स्वास्थ्य, ज्ञान, बुद्धि, विवेक आदि पाने के लिए गहन मेहनत और अभ्यास का रास्ता ही चुनना चाहिए। हमारे कार्यों का संग्रह ही हमारा भाग्य है। भाग्य को हम गहन पुरुषार्थ का संग्रह कह सकते हैं। अच्छे कर्मों के बिना अच्छा भाग्य नहीं बन सकता। कर्म से भाग्य बनते हैं और भाग्य हमारे कर्म को प्रभावित करते हैं। यह श्रृंखला चलते रहती है। ज्ञानियों के अनुसार, अच्छी संगति में रहना और खोटी संगति से बचना ही पुरुषार्थ है। कर्म की श्रृंखला ही भाग्य है, ऐसा समझना श्रेष्ठ है।
(रुसेन कुमार, उद्यमी, पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके चिंतन दैनिक अखबारों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।)
(प्रकाशन की शर्तः इस लेख को किसी अखबार या वेब माध्यमों द्वारा प्रकाशित करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। प्रकाशन का अनुरोध rusenk@indiacsr.in पर भेजा जा सकता है।)



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