दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । तीव्र प्रतिस्पर्धा भावना से बचना चाहिए


प्रतिस्पर्धा करने से हम एक-दूसरे को हानि ही पहुँचाते हैं। आमने-सामने के भिडंत से दोनों पक्षों को नुकसान ही होता है। 

हम दूसरे से आगे बढ़ना चाहते हैं। हमारे पास शक्ति नहीं रहती फिर भी हम दूसरे से आगे रहना चाहते हैं। हर मनुष्य के मन में दूसरों को हरा देने और पछाड़ देने की प्रवृत्ति रहती है। निम्न कोटि के उद्देश्य रखकर प्रतिस्पर्धा से हानि होती है। यह देखा गया है कि किसी बात को लेकर किसी से अत्यधिक प्रतिस्पर्धा करने से परस्पर द्वेष बढ़ता है। आज हम प्रतिस्पर्धा पर बहुत जोर लगाते हैं। प्रतिस्पर्धा करने से प्रतिकूल परिणाम आने पर लज्जा होती है और अनुकूल परिणाम आने पर अहंकार बढ़ता है। 

प्रतिस्पर्धा करने से जीवन में कई नई समस्याएँ जन्म ले लेती हैं। वैसे तो प्रतिस्पर्धा करना मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है, परंतु इस भावना के प्रति सजगता जरूरी है। आज प्रत्येक बात के लिए व्यक्ति प्रतिस्पर्धा कर रहा है। सच्ची प्रतिस्पर्धा ज्ञान अर्जित करने में है। किसी विशिष्ट उद्देश्य को लेकर प्रतिस्पर्धा करने में ही उसकी सार्थकता रहती है। बात-बात पर प्रतिस्पर्धा करने के मनोभाव के पीछे ईर्ष्या की भावना ही बलवती रहती है। अकारण ही दूसरों से आगे बढ़ जाने की प्रबल भावना रखना मानसिक कमजोरी और दुर्बल मन का ही परिचायक है।

दूसरे से किसी भी रूप में अलग दिखने एवं विशिष्ट रहने की भावना का नाम ही प्रतिस्पर्धा है। पूर्ण परिश्रम करने पर जो कुछ भी मिले हमें उससे संतोष करना चाहिए। हमारा एक ही कर्तव्य है कि हम अपने में अच्छाइयों का विकास करें और उसी के सहारे लोगों के साथ व्यवहार करें।

हमारा कोई मित्र उन्नति के रास्ते पर हमसे आगे बढ़ गया, अमुक को उच्च स्तर का पद-प्रतिष्ठा, गौरव, मान मिल गया होगा, किसी का निवास स्थान अत्यंत भव्य है, पुत्र-पुत्री कितने सभ्य हैं आदि विचार प्रतिस्पर्धा जनक भावनाएँ हैं। प्रतिस्पर्धा की भावना एक सीमा तक ठीक है, लेकिन इसकी मात्रा ज्यादा हो जाये तो हमारे जीवन को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित करती है। हमें प्रतिस्पर्धा से आगे जाकर अपनी उत्कृष्टता पर ध्यान देना होगा। प्रतिस्पर्धा का आधार विशिष्ट गुण ही होना चाहिए। जिनके पास भी गुण और उन्नत भावना होती है, वे किसी न किसी तरीके से जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। मूल रूप से देखा जाय तो हमें स्वयं से प्रतिस्पर्धा करनी है ताकि हर दिन हमारा एक सुधरा हुआ रूप हमारे सामने आए।

जीवन गतिशील है। जीवन में हर चीज समय के साथ बदल जाती है। जिसे हमने आज प्रतिस्पर्धा करके पराजित किया है, कल वह अनोखी प्रगति करके हमें परास्त कर सकता है। किसके हाथ में कितनी सफलता लिखी है, इसका अनुमान लगा पाना बहुत कठिन है। हम जो भी करें स्वयं को आगे बढ़ाने के लिए करें न कि किसी को अपमानित करने के लिए। किसी को नीचा करके हमें अधिक समृद्धि पाने से कुछ भी लाभ नहीं है।

हमें स्वयं भी समय-समय पर अपने से ऊँचे गुण वाले लोगों से अपनी तुलना करते रहना चाहिए। तुलनात्मक प्रवृत्ति का सदुपयोग करेंगे तो सुखी रहेंगे। समझदारी से यदि आप अपनी तुलना दूसरों से करें और ईमानदारी से परखें, तो आपको सौन्दर्य, स्वास्थ्य, धन, प्रतिष्ठा, स्थिति आदि की कमी से ग्लानि उत्पन्न नहीं होगी। कई बार हम प्रतिस्पर्धा में स्वयं को बहुत कमजोर पाते हैं। यदि आप स्वयं को ईमानदारी से देखेंगे तो आप पाएँगे कि आपको अपने में अवश्य कुछ –न–कुछ अच्छाइयाँ मिलेंगी, जो आपको आगे बढ़ने में, अच्छाई का विकास करने की प्रेरणा देंगी।

दुनिया में हर चीज एक दूसरे से सापेक्ष छोटी-बड़ी है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी जीवन होता है। प्रत्येक का अपना-अपना क्षेत्र पृथक-पृथक है। जीवन एक दौड़ है। कोई आगे बढ़ेगा। कोई पीछे छूटेगा। इसे सहजता से लेना चाहिए।  उनकी सफलता-विफलता में अनेक चीजों का योगदान होता है। सबके पास किसी न किसी बात की कमी है। सब में कोई न कोई गुण तो है ही। वास्तव में हमें चाहिए कि हम अपनी विद्या, बुद्धि, धन आदि को समूचे समाज की विद्या, बुद्धि, धन आदि से तुलना न करें। गलत चीजों की तुलना करना और अपने को कमजोर पाकर चिंतित होना हीनता की भावना-ग्रंथि उत्पन्न करना है, हमें इसके प्रति सावधान हो जाना चाहिए। हमें हमेशा अच्छाई और अच्छी बातों को लेकर ही प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। 

हमें ध्यान रखना है कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति हमारा प्रतिद्वंदी नहीं है। अपने लिए हम स्वयं एक प्रतिद्वंदी हैं। हमारा मुकाबला हमारे अपने से है। जिस दिन हम स्वयं से मुकाबला करने लगेंगे, बाकी सभी मुकाबले छोटे लगने लगेंगे। जिस दिन हम स्वयं को बेहतर से बेहतरीन बनाते जाएँगे, हमारे समक्ष मुकाबला करने का कोई कारण नहीं रह जाएगा। दूसरों से मुकाबला करने के लिए का अर्थ स्वयं को छोटा साबित करना। हम जब भी दूसरों से अपनी तुलना करेंगे, हम अपने आप को लघुतर ही अनुभव करेंगे। दुनिया में बलशाली और ज्ञानी लोगों की कमी नहीं है। प्रतिस्पर्धा करने से आदमी उलझ जाता है। प्रतिस्पर्धा नहीं करे से आदमी सुलझ जाता है। दूसरों को हानि पहुँचाने बिना ही हमें अपनी मंजिल पर पहुँचना है। अपने रास्ते चलते रहे तो किसी दिन मंजिल आ ही जाएगी। 

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(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)

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