दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार। लोगों को आकर्षित कीजिए
दुनिया में लोग आपस में एक-दूसरे को किसी न किसी रूप में प्रभावित करना चाहते हैं। जीवन में कुछ बेहतर उपलब्धि के लिए हमें लोगों के दिलों को जीतना पड़ता है, लोगों के दिलों पर जगह बनानी पड़ती है। सब लोग एक दूसरे को सकारात्मक या नकारात्मक ढंग से प्रभावित करना चाहते हैं। इन सबके मध्य दिलों की जीत ही सबसे बड़ी जीत है। किसी के दिल पर जगह बना पाना आसान नहीं होता। अनजान से अनजान लोग भी हमें अपना मानने लग जाएँ तो जीवन में कुछ भी कर पाना असंभव नहीं रहता।
लोग हमें अपना समझें तो हमारे लिए मुश्किल काम भी आसान हो जाएगा। अधिक से अधिक लोग हमारे अपने बन जाए तो इसमें कोई हानि ही नहीं है। कोई हमें अपना क्यों मानेगा। लोग हमें अपना तभी मानेंगे, जब हमारे से उसका कोई कार्य सिद्ध होगा। लोग हमें अपना तभी समझेंगे, जब हम उसका किसी काम आएँगे। स्वार्थ या जरूरत की पूर्ति होने पर ही लोग हमें अपना समझते हैं। हमारी उपयोगिता ही हमारी विशेषता है। यदि हम किसी के लिए उपयोगी नहीं हैं तो कोई भला हमें अपना क्यों माने। अपनत्व की भावना होने के लिए कोई विशिष्ट कारण भी होना चाहिए। साधन और साध्य दोनों का होना आवश्यक है।
एक सच्ची भावना होती है और एक दिखावा भावना होती है। सच्ची भावना बहुत स्थायी होती है, बहुत शक्तिशाली होती है। आज अधिकाँश लोग कार्य सिद्धि के लिए भावना का दिखावा आश्रय लेते हुए देखे जा सकते हैं। दिखावा वैसे ही धुल जाता है जैसे बारिश आने पर पत्तों पर जमी धूल धुल जाती हैं। सभी मनुष्य में दिखावा और सच्ची भावना को पहचाने और परखने की शक्ति होती है। इसलिए सच्ची और दिखावा भावना का व्यवहार करते समय कुछ सावधानी तो अवश्य रखनी चाहिए।
शुद्ध रूप में या आदर्श रूप में किसी को अपने अनुकूल बनाने के लिए दो व्यवहारों का अभ्यास करना चाहिए। पहला है – स्वार्थ का त्याग करके उसकी सेवा करना और उसके दोषों की ओर ध्यान न देकर उसके सद्गुण, सदाचार आदि की तरफ देखना।
आज स्वार्थ का त्याग करके सेवा करना बहुत कठिन कार्य है, लेकिन यह असंभव भी नहीं। दिल में थोड़ी सहृदयता रखकर लोगों की सेवा की जा सकती है। सभी विषय अभ्यास पर निर्भर करता है। सहृदयता का थोड़ा-थोड़ा अभ्यास भी बहुत असरकारक होता है। तीव्र स्वार्थ को किनारे छोड़कर सहृदयता रख करके सहायता करना और सेवा करने पर व्यक्ति के मन में तुरंत सकारात्मक असर होता है। वास्तव में स्वार्थ अनेक अच्छे काम को भी बिगाड़ देता है। केवल और केवल स्वार्थ है और सहृदयता व सहयोग भावना का नितांत अभाव है तो काम बनेगा ही नहीं, आप कितनी भी कोशिश कर लीजिए। स्वार्थ को सहृदयता के द्वारा दमन किया जा सकता है। स्वार्थी मनुष्य अधिक लोकप्रिय नहीं हो पाते। हमारे कार्य औरों के लिए जितना ज्यादा उपयोगी होंगे, लोग हमें उसी मात्रा में जानने-पहचानने लगेंगे। सेवा करने का अर्थ है, उसके काम की पूर्ति में सहयोग करना।
यदि हम किसी को अपनाना या अपना बनाना चाहते हैं तो हमें उसकी आलोचना करते समय हमें समझदारी दिखानी होगी। किसी की आलोचना करके हम उसके दिल पर जगह नहीं बना सकते। जिसे अपना प्रिय बनाना चाहते हैं, उसके प्रति अप्रियता रखने से वह हमें अपने दिल पर रहने के लिए जगह नहीं देगा। आलोचना सुनने की शक्ति किसी-किसी में ही होती है।
आमतौर पर लोग आलोचना सुनते ही परेशान हो उठते हैं। आलोचना करने से लोगों को यह लगने लगता है कि हम उसकी समझ, अनुभव और ज्ञान आदि का निरादर कर रहे हैं, जबकि ऐसी हमारी कोई मंसा नहीं होती, फिर भी वह इसी का अनुभव करता है। आलोचना करना एक प्रकार की बुराई है, जिसके द्वारा हम अन्य लोगों के दोषों को देखने लगते हैं। जो भी मनुष्य जीवित है, उसमें कोई न कोई दोष तो अवश्य होगा, उसी ही ढंग से उस व्यक्ति में कोई न कोई गुणवत्ता या उपयोगिता भी होगी। हमें अक्सर उसके उपयोगी पक्ष पर ही नजर डालना चाहिए। ऐसा करना सरल नहीं है। इसके लिए विधिवत अभ्यास करना पड़ेगा।
सार बात यह है कि यदि हम आगे के जीवन को उपयोगी और सार्थक बनाना चाहते हैं तो हमें अधिक से अधिक लोगों को अपना हितैषी बनाना होगा। लोग हमें अपना हितैषी समझें, प्रिय माने इसके लिए उनके विरुद्ध बोलने और उनकी आलोचना करने से बचना होगा। हमारा व्यक्तित्व चुम्बक की तरह बने।
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(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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