दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । कर्तव्य निभाने से मनुष्य की गरिमा बढ़ती है
इस लेख को पढ़कर आपको पता चलेगा कि आपका असली कर्तव्य क्या हैं? अपने कर्तव्य पहचानिए और प्रगति कीजिए।
मुझे कैसे पता चले कि मेरा कर्तव्य क्या है? यह कौन बताए कि मुझे क्या करना चाहिए? मुझे किनके द्वारा पता चलेगा कि मेरे लिए क्या करना उचित है? कर्तव्य या उत्तरदायित्व, जिम्मेदारी आदि सब एक ही बात है। हमने लोगों को कर्तव्य पालन में आने वाली कठिनाई के बारे में शिकायत करते तो अवश्य सुना होगा।
हम अपने प्रति दूसरों से जिस व्यवहार की अपेक्षा करते हैं, वही हमारा असली कर्तव्य है। सामान्य तौर पर अपने लिए हम दूसरों से चाहते है कि - वे हमारी प्रशंसा करें, आदर दें, मान दें, सहायता करे, हानि न पहुँचाए, विनम्रता का व्यवहार करे, सेवा करे, आगे बढ़ाने में योगदान दे, झूठ न बोले, बुरा न बोले, चोरी न करे, अभद्र व्यवहार न करे आदि। इस बात से हमारे अपने कर्तव्य की पहचान हो गई कि हमारा अपना असली कर्तव्य क्या है। हमारा कर्तव्य है कि हम दूसरों की प्रशंसा करें, आदर दें, बड़ाई करें, गौरव बढ़ाएँ, सहयोग करें और सेवा करें। इस तरह कर्तव्य का अर्थ बनता है करने योग्य काम। वह कार्य जिसे करना है और उसे करना आवश्यक भी है। कर्तव्य में किस काम को करना होता है और किस काम को नहीं करना होता है, इसका भलीभाँति बोध रखना चाहिए।
समाज में रहने के कारण एक व्यक्ति के सैकड़ों कर्तव्य पूर्व से निर्धारित रहते हैं। समाज में रहने के लिए उसे हर घंटे कुछ न कुछ कर्तव्य निभाने पड़ते हैं। घर में है तो उसे घरेलू कर्तव्य निभाने पड़ते हैं। घर के बाहर है तो उसे सामाजिक कर्तव्य निभाने पड़ते हैं। हर काम के पीछे एक कर्तव्य जुड़ा हुआ होता है। कर्तव्य आकार में छोटे और बड़े भी होते हैं। जो भी व्यक्ति जिसे अपने कर्तव्यों की पहचान रहती है वे शीघ्र ही प्रगति कर लेते हैं। जो अपने कर्तव्यों को निभाने में आनाकानी करते हैं वे विपत्तियों से घिर जाते हैं। अपने कर्तव्य की उपेक्षा करते हैं वे अपयश और अपमान पाते हैं।
विद्यार्थी के रूप में हमारा कर्तव्य है हम अधिकाधिक विद्या सीखें, शिष्ट व्यवहार करें, अनुशासित रहें, अधिक से अधिक समय रचनात्मक कार्य करें आदि। पिता के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम अपने परिवार का उचित देखभाल करें, बच्चों का समुचित पालन-पोषण करें। सामाजिक, आर्थिक जरूरतों को पूरा करें, बुर्जुगों की देखभाल करें आदि। देश के नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम ऐसे कार्य ही करें जिससे अपनी और सबकी प्रगति सुनिश्चित हो। वह कार्य न किया जाय जिससे किसी का अहित होता हो। किसी ऊँचे पद पर हैं तो हमें उस पद से जुड़े उत्तरदायित्वों को अधिकतम सीमा तक निभाना चाहिए। एक-दूसरे के प्रति सबकी अपेक्षाएँ एक जैसी ही होती हैं।
स्थिति-परिस्थिति के अनुसार कर्तव्य परिवर्तनशील है। एक मनुष्य के रूप में हमारे कुछ सार्वभौमिक कर्तव्य हैं। कुछ राष्ट्रीय कर्तव्य हैं और कुछ सामाजिक जिम्मेदारी है।
कर्तव्य उसे कहते हैं, जिसे सुखपूर्वक कर सकते हैं, जिसे अवश्य करना चाहिए अर्थात जो करने योग्य है और जिसे करने से उद्देश्य की सिद्धि अवश्य होती है। वास्तव में कर्तव्य सदैव परहित की दृष्टि से किया जाता है। कर्तव्य में सकारात्मकता होती है। कर्तव्य में रचनात्मकता होती है। कर्तव्य का मुख्य तत्व है अहित न करना, हानि न करना। वास्तव में देखा जाय तो कर्तव्य एक महान कर्म है। कर्तव्य-कर्म का पालन करने में परिश्रम नहीं लगता। कर्तव्य-कर्म सहज, सरल होता है, क्योंकि इसका बोध प्रत्येक व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से होता है। लोभ, क्रोध, आलस्य और मोह आने से ही कर्तव्य-कर्म निभाने में बाधा पड़ती है।
कर्तव्य का पालन न होने पर तथा अपने से बुरा काम बन जाने पर पश्चात्ताप करना चाहिए, जिससे कि आगे फिर वैसा न हो। कर्तव्य कर्म को झंझट मान लेने पर वह भार रूप हो जाता है, फिर कर्तव्य पालन लाभदायक नहीं होता।
मनुष्य के कुछ मुख्य कर्तव्य भी हैं। आलस्यवस मनुष्य इन कर्तव्यों की निरंतर उपेक्षा करते रहता है। मनुष्य का सर्वोत्तम कर्तव्य है स्वयं के विचार को उन्नत बनाना, अपने चरित्र को विकसित करना और स्वयं को एक विशाल बरगद के पेड़ की तरह विकसित करना । इस बात को भलीभाँति समझना होगा कि विचारों के उन्नतिकरण के अभाव में कोई भी व्यक्ति अपने कर्तव्य ठीक से नहीं निभा सकता। हमें सर्वप्रथम अपनी वाणी पर नियंत्रण रखने का कर्तव्य निभाना होगा। अपनी वाणी को मूल्यवान वस्तु के रूप में समझना होगा। सभी बातों के व्यवहार के लिए वाणी ही आधार है। हम सजग रहें कि वाणी के द्वारा किसी की गरिमा को ठेस न पहुँचे। हम जितना अधिक अपना कर्तव्य निभाएँगे, समाज और दुनिया उतना ही सुंदर बनेगा। इसीलिए हमें अपने कर्तव्य स्वप्रेरित होकर निभाना है। कर्तव्य निभाने में किसी के आदेश की प्रतीक्षा मत कीजिए। स्मरण रखना है कि हमारा जीवन कर्तव्य पूर्ण है। स्वयं का उन्नतिकरण ही हमारा मुख्य कर्तव्य है। विवेक के अभाव में कर्तव्य अर्थहीन और अप्रभावी हो जाता है। कर्तव्य-कर्म को विवेक द्वारा निर्देशित और संचालित करना चाहिए। यह सिद्धांत की बात है कि कर्तव्य निभाने से मनुष्य की गरिमा बढ़ती है, उसके व्यक्तित्व पर चिपके विकार धुल जाते हैं।
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(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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