व्यंग्यः रुसेन कुमार । यहाँ सबको गर्व करने की आजादी है
हमारे देश में एक सज्जन हैं जिनकी गितनी अग्रणी समकालीन महापुरुषों में होती है। उनकी विद्वता के कारण लोग उनका चरण धोकर पीते हैं। बुद्धि इतनी तीक्ष्ण है कि अखबारों में लिखना उनके लिए चुटकी बजाने जैसा काम है। इतने ऊँचे किस्म के हैं वे सनातन पुरुष। कुछ दिनों पहले की बात है भगत किस्म के इस सज्जन का एक लेख किसी दैनिक अखबार में छपा।
हाँ, अपने ठीक समझा है। वही अखबार जो रोज सूरज की तरह निकलना अपना कर्तव्य समझता है। ऐसा अखबार जिसे गरीब लोग ट्रेन में बिछाकर सो जाया करते हैं। वही अखबार जिसमें गर्म तैलीय समोसों को लपेटा जाता है। उस दिव्य भगत पुरुष का यह लेख उनके नाम के अनुरूप अत्यंत भक्ति भाव से ओत-प्रोत था।
पढ़ाकू किस्म के होने के नाते हमने इस अखबार की रोशनी को अपने मन में प्रवेश करा दिए। अर्थात् एक सांस में पढ़ डाले। यह सोच करके सारे शब्द और वाक्य गटक लिए कि ये महापुरुष आज कोई महान रहस्य की बातों से पर्दा उठाने वाले हैं और किसी अनोखे रस का रसास्वादन कराएँगे।
हमने उलट-पलट कर पढ़ डाले ताकि कोई काम की बात छूट न जाय। वैसे हमारे लिए यह मजबूरी है जनाब, न पढ़ो तो दिन अधूरा-सा लगता है। हमें ज्ञात हुआ कि इस महापुरुष ने लेख को विशेष रूप से अपना गर्व व्यक्त करने के लिए लिखे थे। आदि से अंत तक यही बताते रहे कि वह किसी खास वर्ग का आदमी है, इसलिए उसे इसका गर्व है। यह बात भी बताई कि बीते दिनों उन्होंने एक त्योहार विशेष में सात दिनों का उपवास भी रखा। उसका भी उन्हें गर्व था। उसने कहा – मुझे अपने धर्म पर गर्व है। फिर उनसे आगे यह भी कह दिया कि इससे वे प्रेम करते हैं।
वह गर्व करने के लिए बेबस नजर आ रहे थे। मेरा माथा ठनका। आखिर किसी आदमी को क्या मजबूरी हो सकती है कि वह बात-बात पर अपना गर्व व्यक्त करे? ऐसा लगता था मानो उसे गर्व करने के लिए उकसाया गया है। आज के समय में बिना उकसाए मजाल है कि किसी में आज गर्व का बोध हो जाय। किसको इतनी फुर्सत है।
गहराई से पढ़ने पर असली भेद का पता चला कि उस महामना ने गर्व जताने के लिए नहीं बल्कि वर्ग बताने करने के लिए लेख लिखे थे। वह बताना चाहते थे कि वह अमुक वर्ग का है क्योंकि वह अमुक धर्म और फलां त्योहार को मानता है। इतने दिनों का भी उपवास रखता है। आप बाकी कुछ माने या न माने, यह तो मानना पड़ेगा कि हमारे देश में एक विशेष प्रजाति के लोग हैं जो केवल गर्व करके ही जिंदा रहते हैं। वे अक्सर गर्व करने के विषयों पर यहाँ-वहाँ लिखते पाये जाते हैं। आजकल के अखबार गर्व के प्रचारक जो हैं। वे छद्म गर्व को फैलाते हैं और अपना 'उल्लू सीधा' करते हैं।
सच बताऊँ तो जिसमें जितनी अधिक वर्गभेद की भावना होगी, उसमें उतनी अधिक गर्व की मात्रा होगी। यह कितने महान संयोग की बात है 'गर्व' शब्द के क्रम को उलट देने पर वह 'वर्ग' बन जाता है। वास्तव में ये दो नहीं बल्कि एक ही शब्द के उलटफेर से उपजे हैं। चूंकि ये दोनों एक ही पदार्थ से बने हैं इसलिए इन दोनों का स्वभाव अत्यंत ही ज्वलनशील है। आपने खुदा-न-खास्ता किसी के गर्व को जरा-सी ठेस पहुंचाने की हिमाकत की तो वे इसका मुंहतोड़ जवाब देना अपनी महति जिम्मेदारी समझेंगे। उनकी वर्गभेद आधारित भावनाएँ भड़क उठेंगी और ऐसा विचित्र अंदाज में आतंक मचाएँगे जिससे कि आपका जीना मुहाल हो जाय।
मेरी तो सलाह यही है कि इन ज्वलनशील पदर्थों को अपने आस-पास मत रखिए, जहाँ तक हो सके दूरी बनाइये वरना ये कभी भी थोड़ी-सी दुर्भावना की आँच में भड़क उठेंगे और आपके आस-पास की दुनिया को खाक में मिला देंगे। गर्व को शिष्टाचार के लिए रखिए जनाब, खाने में नमक के समान। इसे थोड़ी ही मात्रा में ही रखने में बुद्धिमानी समझिए।
हमारे समय की विडम्बना देखिए, यहां हर किसी को किसी न किसी बात का गर्व होता है। हमारे देश में कोई कितना भी गर्व कर सकता है। यहां सबको गर्व करने की खुली आजादी है। वैसे तो यह अकाट्य सिद्धांत है कि जो भी वर्गीय किस्म का व्यक्ति होगा, वह गर्व करने से बच नहीं सकता।
हम भारतीय हैं तो हमारे लिए गर्व करने के लिए यह काफी नहीं है, हमें कुछ और चाहिए। यही तो असली मर्ज है। कुछ हो न हो गर्व होना चाहिए। वरना लोग हमें कुछ समझेंगे ही नहीं। आजकल गर्व ही हमारी पहचान है। गर्व करना हमारी व्यक्तिगत एवं सामाजिक मजबूरी भी है। कुछ स्थानों पर कौन दबंग है और कौन निर्बल इसका अंदाजा लगाने का नया मापक यंत्र है - गर्व।
हम भारतीयों में गर्व की भावना न हो तो हम लोग जीते जी मर जाएँगे। गर्व न हो तो यहाँ आदमी जिंदा लाश है। यहाँ गर्व ही व्यक्ति के जीवन को कंधों पर ढोए फिरता है।
किसी को जीते-जी मारना है तो पहले उसके गर्व के कारण को छीन लीजिए। गर्व जाते ही मनुष्य विष रहित सर्प के समान अस्त्र हीन हो जाएगा। इधर उसका गर्व खत्म हुआ, उधर उसके अस्तित्व का अंत हुआ। शादय इसी कारण से लोग गर्व को बचाए हुए हैं। यह अलग बात है कि प्रत्येक प्रजाति के सर्प को अपना विष अत्यंत प्रिय होता है। विषैलापन ही तो डराता है, वरना लंबी मछलियों से भला कौन डरता है।
आज के दौर में यदि किसी धर्म को मानते हैं तो उस पर गर्व होना चाहिए। हम फलां वर्ग के हैं तो उसमें भी गर्व रखना है। हम अमुक त्योहार को मानते हैं तो भी गर्व मानना है। ढिकना नदी में नहाते हैं तो उसका तो अवश्य ही गर्व होना चाहिए। हम उपवास रखते हैं तो हमें उसका विशेष गर्व होना चाहिए। हम ढमके गोत्र के हैं तो उसका गर्व होना चाहिए। हमारे माता-पिता अच्छे हैं तो उन पर हमें गर्व करना चाहिए। गुरु ने अच्छी शिक्षा दी है तो उनके उपकार का गर्व होना चाहिए।
अब यह बात इतनी अधिक आगे निकल चुकी है कि कुछ लोगों को अपनी लाईलाज बीमारी पर भी गर्व करने लगे हैं। हर तरफ गर्व का ही जलवा है भाई। सचमुच में जिनके पास गर्व करने के कोई कारण नहीं, उनकी कोई विशेष हैसियत नहीं आज के समाज में। वे असहाय हैं, अपरिचित हैं, गुमनाम हैं। इसलिए आज के समय में हर व्यक्ति के पास गर्व करने के लिए कुछ न कुछ तो होना ही चाहिए। लोग कहेंगे, वैसे अपनी अच्छाईयों पर गर्व करने में क्या बुराई है? अपने को गर्व की तख्ती को हरदम साथ में रखना है ताकि कुछ भी अनहोनी आ जाने पर उसे आगे किया जा सके। जीवन रक्षक है गर्व।
अधिसंख्य समकालीन महापुरुषों को अपने गर्व को पाले-पोसे रखना राजनीतिक मजबूरी है। अपनी पहचान बढ़ाने के लिए वे बेधड़क इसका बेजा इस्तेमाल करते नहीं अघाते है, इस पर हमें घोर आपत्ति है। भेद की बात तो यह है कि आजकल कुछ लोगों को बाकायदा इसका प्रशिक्षण मिलने लगा है ताकि वे अच्छे से गर्व व्यक्त कर सकें। उन्हें समझाया-बुझाया जाता है कि गर्व की मात्रा कम हो जाए तो लोग पूछेंगे ही नहीं। पहचानेंगे ही नहीं। गर्व बढ़े, पहचान बढ़ी। जितना अधिक गर्व उतनी अधिक पूछ-परख।
मेरे देश के युवाओं तुम तो कुछ करो न करो अपने भीतर गर्व बढ़ाओ। कुछ लोग हैं जो तुम्हें मुफ्त में गर्व करना सिखाएँगे। तुममें गर्व भरेंगे फिर उसे बाद में भड़काएँगे। इस तरह वे तुम्हारी असीम संभावनाओं का गला घोट देंगे। यह आवश्यक है कि आत्ममुग्ध होकर तुम अपना गर्व, वर्ग और भड़काऊ भावना को निरंतर प्रबल करो ताकि तुम्हें कोई कुछ कहे तो ईंट का जवाब पत्थर से दे सको। तुममें इस बात का सदैव गर्व होना चाहिए कि कम से कम तुम ईंट का जवाब पत्थर से अवश्य दे सकते हो। वैसे तो तुम्हें अपने ईंट और पत्थर पर भी गर्व करना चाहिए, क्योंकि यही तो आजकल तुम्हारे गर्व के रक्षक हैं। गर्व एक कवच है – पहन लीजिए, दोहरा लाभ है - घात से बचेंगे और आघात करने की शक्ति भी आएगी। इस हिसाब से गर्व अत्यंत घातक वस्तु है। लेकिन इसका स्मरण रखना अगर तुमने आज गर्व करना सीख लिया तो कल तुम्हारे पास कुछ करने के लिए वक्त और बुद्धिमानी ही नहीं बचेगी। गर्व करना बुद्धिहीनों का प्रिय काम है।
सच मानिये तो गर्व करना बहुत ऊँचे किस्म का काम है। गर्व करना एक महान भावना है, गुण है। वैसे हमारे आस-पास अनेक बातें हैं जिनके लिए हमारे मन में सचमुच में गर्व होना चाहिए। चाहे जो हो जाय, हमें अपने दुर्गुणों पर गर्व नहीं होना चाहिए। इतना अधिक पढ़ लिख लेने के बाद भी अपने को किसी वर्ग का माने रहना सबसे बड़ा दुर्गुण है। हमें अक्सर दुर्गुणों पर अफसोस होना चाहिए न कि गर्व। लेकिन उससे हमें क्या। आखिर उनका क्या किया जाय जो मोहल्ले की बजबजाती बदबूदार नाली पर गर्व करते नहीं अघाते। दरअसल वे गर्व करने के बहान से गुर्राते हैं। उनकी गुर्राहट एक धारदार हथियार हैं। आजकल निठल्लों का बस एक ही काम है गुर्राना और उस पर गर्व जताना।
गर्व करने से कोई न बचा है और न ही बच सकता है। मनुष्य जाति में वह हैसियत नहीं कि वह गर्व करने से बच जाय। गर्व महाभूत है। कालातीत है। यह वर्तमान, भूत और भविष्य - सभी कालों में अजेय है। मनुष्यों को इस अवगुण से छूटकारा पाना असंभव है। ऐसी कोई दवा नहीं बनी आजतक जो हमारे गर्व की आदत को कमजोर कर दे। हमारे भीतर का गर्व हमारे मरने के बाद भी नहीं मरेगा। हमारे जाने के बाद हमारे अपने ही हम पर गर्व करेंगे क्योंकि आज हमारे पास पहचान के नाम पर वर्गवाद ही अवशेष रह गए हैं।
वास्तव में हमें गर्व करने का कुछ न कुछ बहाना चाहिए। हम भारतीय पक्के किस्म के बहानेबाज लोग हैं। यह एक अच्छा सस्ता सुलभ बहाना है मन बहलाने के लिए। गर्व करने से ठीक तरह से मन बहलता है हमारा। गर्व के भार से रोज दबे चला जा रहा है भारत वर्ष और किसी को कोई फिकर ही नहीं। कहीं ऐसा न हो कि हम किसी दिन गर्व के बोझ से पूरी गर्त में न चले जाएँ।
पता नहीं आखिर क्या मजबूरियाँ हैं लोगों की कि उसने गर्व करने के इतने साधन इक्ट्ठा कर रखे हैं। आप माने न मानें, भविष्य में मानव जाति पर जो भी अनहोनी और विपदा आएगी इसी के कारण से आएगी। सुनामी भी इसी कारण से आई होगी शायद। उधर प्रकृति ने गर्व किया होगा और इधर तबाही आई। बहुत संभव है कि कोरोना महामारी भी इसी कारण से आई हो। किसी ने भूल से गर्व कर लिया होगा अपनी शैतानी खोपड़ी पर। आजकल के अस्त्र-शस्त्र खोपड़ी में ही छुपे रहते हैं।
खैर, जिनका व्यापार चलता है मौतों से, वे किसी न किसी दिन कहेंगे ही हमें कोरोना बीमारी पर गर्व है। देखिएगा यह बीमारी भी जाएगी गर्व करने से क्योंकि हमें अपने वैज्ञानिक खोजों और नवीनतम दवाइयों पर बड़ा गर्व है। तो फिर डर किस बात की है आप तो खूब गर्व कीजिए। फिर भी मैं यही कहूँगा कि गर्व ही सभी बीमारी का बापू है। गर्व ही किसी दिन रोग बनता है। इस रोग को और अधिक फैलने से रोकिए जनाब।
(रुसेन कुमार, उद्यमी, पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके चिंतन दैनिक अखबारों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।)
(प्रकाशन की शर्तः इस लेख को किसी अखबार या वेब माध्यमों द्वारा प्रकाशित करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। प्रकाशन का अनुरोध rusenk@indiacsr.in पर भेजा जा सकता है।)



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