दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार। आत्मग्लानि निवारण के उपाय
दुनिया में सब कुछ परिवर्तनशील है। जो आज है वह कल नहीं होंगे। कल जो चीज हमारे सामने थी वह आज वैसी स्थिति में नहीं है। लोगों का व्यवहार, विचार और नजरिया परिवर्तनशील है। कई बार हम लोगों से अज्ञानतावश ऐसी अविस्मरणीय गलतियाँ हो जाती हैं, जिसका दुःख गहरे मन में बना रहता है। या फिर उस अप्रिय घटना के लिए कुछ मात्रा में स्वयं को जिम्मेदार मानने लगते हैं।
यह स्मरण रखने योग्य बात है कि प्रत्येक घटना केवल संयोग मात्र होती है। भली या बुरी समझे जाने वाली घटनाओं के पीछे अनेक कारण रहते हैं। इसके लिए किसी एक को जिम्मेवार ठहराना उचित नहीं है। किसी घटना के लिए स्वयं को दोषी ठहराना तो बिल्कुल ही अव्यावहारिक बात है।
आत्मग्लानि अर्थात् भीतर ही भीतर दुःख का अनुभव करना और उसके लिए स्वयं को उत्तरदायी समझना। कभी-कभार अज्ञानता में कुछ ऐसी अप्रिय एवं दुष्कृत्य घटनाएँ हो जाती हैं, जिसके लिए स्वयं को दोषी समझने के कारण तीव्र वेदना होती है। यह लम्बे समय तक अपने में बनी रहती है। आत्मग्लानि का अर्थ है दुखद बातों का बार-बार चिंतन करना। दुखद बातों को विस्मृत करने के लिए कोई कला सीखनी चाहिए। नियमित रूप से प्रेरणादायी किताबों को पढ़ना चाहिए।
हमारे जीवन में बहुत कुछ अच्छी बातें हैं, हमारे हाथों से अनेक अच्छे कार्य हो रहे होते हैं, मन को उनसे प्रेरणा दीजिए। किसी बात के लिए सकारात्मक तर्क कीजिए। वितर्क, अति तर्क और कुतर्क करने से बचिए।कई बार तो अपनी कुछ आंतरिक गोपनीय वेदनाओं को दूसरों के समक्ष अभिव्यक्त करना व्यावहारिक मालूम नहीं होता। वे इतने सूक्ष्म और मार्मिक होती हैं कि उनकी अभिव्यक्ति करना बड़ा ही कठिन कार्य होता है। अनेक मानसिक अड़चन आती हैं, फिर भी किसी अत्यंत प्रियजन को आत्मग्लानि की बात को अवश्य साझा करना चाहिए। कोई भी गलती जीवन से बड़ी नहीं है।
किसी बात का लंबी अवधि तक आत्मग्लानि रखना मानसिक विकारों को जन्म दे सकता है। आत्मग्लानि का एक कारण गुप्त भय है। दूसरा कारण मानसिक दुर्बलता है। आत्मग्लानि करने से जीवन की आकांक्षाएँ, अभिलाषाएँ और उमंगें अधखिली कली की भाँति असमय ही मुरझा जाती हैं।
जो घटना हो चुकी है उसे बदला नहीं जा सकता। इसलिए शोक का कारण नहीं बनता। बीती हुई घटनाओं के प्रति धारणाएँ अवश्य बदलती जा सकती हैं। नजरिया बदलने पर घटनाओं के अर्थ बदल जाते हैं। मन को दृढ़ करके, उदार भावना रखकर बीती हुई अप्रिय घटना को भूला देने में ही भलाई रहती है। वैसी गलती पुनः न हो इसके लिए सजग रहना आवश्यक है।
बुराई के विपरीत भलाई का, हिंसा के विरुद्ध अहिंसा का, घृणा के विपरीत प्रेम का, भय के विपरीत साहस रखकर पूर्व में हुए अप्रिय घटनाओं के प्रति पश्चात्ताप करना निश्चय ही उचित है। अधिक दिनों तक मन में शोक और आत्मग्लानि के भाव रखने से मनुष्य की बड़ी मानसिक हानि होती है। अधिक शोक करने से बहुत-सी सृजनात्मक शक्ति का ह्रास होता है। अबोध नवयुवक, नवयुवतियाँ अति उत्साह और कुसंग के कारण दुःखदायी कार्य कर बैठते हैं।
गलती का बोध होने पर पश्चाताप करने के लिए स्वयं का हानि नहीं करना चाहिए और न ही इसका विचार मन में लाना चाहिए। आत्मग्लानि बढ़ने न दीजिए, अन्यथा इससे जीवन में नैराश्य और मानसिक दुर्बलता पनप सकती है। किसी बात पर अटक मत जाइये, आगे बढ़िये, जीवन का आनंद लीजिए, शोक मत रखिए। जीवन में हमें अविचल साहस और असीम धैर्य से काम करना चाहिए। बहुत-से लोगों की सफलता और समृद्धि का कारण यही है कि वे अपनी गलतियों को ऊपर उठने के लिए उपयोग करते हैं।आप व्यर्थ ही डरे नहीं, शोकमग्न मत रहिए, अपने जीवन को दुःख में मत डुबोइए, मूल्यवान जीवन को केवल पछतावा में मत बिताइए। अपनी भलाई के साथ औरों के हितों के लिए काम कीजिए। बड़े नहीं तो कुछ छोटे ही सही, कोई नेक काम करना आज से ही प्रारंभ कीजिए।
(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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