दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । मन ही सभी चीजों का जन्मदाता है


मन का अनियंत्रण ही समस्याओं का कारण है। मन का सदुपयोग ही आनंद की अनुभूति कराएगा। दूसरों में दोष नहीं होते बल्कि दोष हमारे मन में होता है। कोई भी आदमी बुरा नहीं है बल्कि हम बुरे हैं। बुरे आदमी को हर जगह बुराई दिखती है। बुरे मन के कारण सब जगह बुराई दिखाई पड़ती है। दिखती नहीं बल्कि देखना पड़ता है, यह सिद्धांत की बात है। इसीलिए जो भी करना होगा मन को मजबूत करके करना होगा।

कमजोर मन के साथ कोई ऊँचा कार्य नहीं किया जा सकता। कागज के बर्तन बनाकर उसमें आग को रखा नहीं जा सकता। मन को बार-बार समझाना पड़ता है। मन को बार-बार समझाने का नाम ही अभ्यास है। मन को बार-बार समझाए बिना बात आगे नहीं बढ़ेगी। मन का काम है भटकना। बुद्धि का काम है उसे काम में लगाए रखना।

मन को ऊँचे कार्य में लगाने का अभ्यास करना ही होगा। बिना काम के मन की शक्ति यूँ ही बहती रही है। जैसे खुले नल के आगे बाल्टी नहीं रखने पर पूरा पानी बह जाता है, रुकता नहीं है। ऐसे ही अभ्यास की बांध बनाकर मन की शक्ति को ठहराया न जाय तो मन की सारी शक्तियाँ बह जाएंगी।

एक साधारण आदमी मन का गुलाम होता है। मन की गुलामी का अर्थ है मन की दुर्बलता के गुलाम होना। बिना उद्देश्य के मन इधर-उधर भागते रहता है। यदि किसी को लक्ष्य नहीं मालूम तो जीवन भर चलने के बाद भी कहीं नहीं पहुँच पाएगा।

जो भी मिलता है, उसे मन ही दिलाता है। जो भी दिलाएगा मन ही दिलाएगा। मन ही सभी चीजों का जन्मदाता है, प्रदाता है। मन की चिंतन शक्ति ही भाग्य विधाता है। मन में जिसका चिंतन होगा, वैसा कार्य मनुष्य की इंद्रियों को करना पड़ता है। मन के संयोग से पांच इन्द्रियाँ – आंख, कान, नासिका, रसना एवं त्वचा - पांच तरह की कामनाएँ पैदा करती हैं।

देखने की कामना, सुनने की कामना, रस लेने की कामना, स्पर्श करने की कामना और सूंघने की कामना। इन पाँचों के अतिरिक्त मनुष्य की कोई और कामना नहीं होती। इन्द्रियां मन की दास हैं। इन्द्रियां आनंद चाहती हैं। इन्द्रियां आनंद की दास है। मन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए मनुष्य को आनंद प्रदान करना। मन में खराबी के कारण मन को आनंद नहीं मिलता।

अंतःकरण को शुद्ध किए बिना आनंद नहीं मिलता। सोचना मन का प्रमुख काम है। सभी बातों का कर्ता मन है। मन में जैसे विचार डाले जाएँगे उसी प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन होगा। कोई भी घटना दो बार होती है। एक बार अभौतिक रूप में मन के भीतर में तथा दूसरी बार भौतिक रूप में मन के बाहर।

मन में हजारों-लाखों विचार नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होते रहते हैं। ठीक उसी तरह जैसे सागर में प्रत्येक क्षण लहरें उठती रहती हैं। विचार और भावनाएँ मनुष्य के मन की लहरें हैं। मन एक विशाल सागर है - विचार, भावनाओं और यादों का।

मन में महान विचार भी जन्म लेते हैं और पतन करने वाले विचार भी। जिस समय महान विचार पैदा होते हैं उसी समय उसको पकड़ लेना चाहिए। उसे लिख लेना चाहिए। मन की हजारों-हजार शक्तियां हैं। मन की अनंत संभावनाशील शक्तियों के सामने सभी शक्ति लघु है, अल्प है। जो लोग मन की शक्तियों को समझ जाते हैं, वे मन में उन्नत विचारों को पढ़ने एवं लिखने की क्रियाओं के द्वारा मन की शक्तियों को जगाते हैं।

कोई आदमी पैदा होते ही चोर, शराबी, डाकू, व्यभिचारी नहीं होता। हर व्यक्ति निर्मल होता है जन्म के समय। बुराई सिखाई जाती है। सीखी जाती है। बचपन में हमें झूठ बोलना नहीं आता था। लेकिन मन में बार-बार अभ्यास से न जाने यह बुराई कब आ गई। मन रोज हजारों चीजें ग्रहण करती रहती हैं। हमारा मन, बुद्धि आदि किन बातों को ग्रहण कर रहा है इसके प्रति सावधान और सचेत रहना होगा।

यदि इसके प्रति सचेत न रहा जाय तो मन महान दुश्मन है। जरा-सी असावधानी आने पर मन बुराई वाले कार्य हमसे करवा लेता है। एक साधारण मनुष्य के मन में अनुपयोगी बातें घास के समान उगी रहती हैं।

आज किसी बात को जानने से काम नहीं चलेगा। सिर्फ जान लेने से काम नहीं बनने वाला, उससे आगे बढ़ना पड़ेगा। मनन करना पड़ेगा। निरंतर चिंतन करना होगा उन बातों का। चिंतन के बिना निर्णय नहीं होगा। जिसका अधिक चिंतन होगा उसे करना भी पड़ता है। करना होगा नहीं बल्कि करना पड़ेगा। यह नियम की बात है।

मन में उपस्थित चिंतन क्रिया में ही शक्ति निहित होती है। जिस बात का बार-बार चिंतन होता है, उसी स्वभाव की  चीजें हमारे पास उपस्थित हो जाती हैं। जो जिसको प्रिय होते हैं, जो जिसका चिंतन करते हैं, उसे वह बात, वस्तु, वह विचार बिना श्रम के भी प्राप्त हो जाते हैं। जैसे चिंतन होता है, वैसी स्थिति निर्मित हो जाती है।

मन तीन महाशक्तियों का स्वामी है। यह शक्तियाँ हैं – मानने की, जानने की और करने की। बाकी की सभी बातें, इन्हीं का विस्तार हैं। इन्हीं तीन बातों से ही दुनिया की सभी गतिविधियाँ चलती हैं।

जो मन की अनंत शक्तियों का स्वामी है उसी महानता का नाम ही तो मनुष्य है। मनुष्य की यह सभी शक्तियाँ उसके मन या अंतःकरण के अधीन रहती हैं। मन के द्वारा ही यह शक्तियाँ संचालित होती रहती हैं। मन रूपी मशीन से ही सारे कार्य होते हैं। मन के भीतर ही सभी इन्द्रियों का सार सूक्ष्म रूप में रहता है।

मन सभी इन्द्रियों की शक्तियों का सम्मिश्रण है। इस मशीन का नाम अंतकरण है। बुद्धि ने मन को बताया। मन ने इंद्रियों को आदेशित किया। और इस तरह इन्द्रियों ने अपने कार्य कर दिए। अगर बुद्धि अर्थात अंतःकरण ठीक हो, उन्नत हो जाय तो सभी काम ठीक हो जाय।

मन को अनेक बातों का – भले का, बुरे का अभ्यास पड़ा हुआ रहता है। सबको अहंकार रहता है अपनी बुद्धि का। मन को संभालना बड़ा कार्य और बड़ा उत्तरदायित्व है। सब खराब हैं – मैं अच्छा हूँ, ऐसा मन स्वाभाविक रूप से सोचता है। चाहे उसमें ज्ञान हो या न हो, प्रत्येक मनुष्य स्वयं को ज्ञानी मानता है। सबसे रहस्यमी बात यह है कि मन अपने को कभी भी खराब नहीं मानता, वह स्वयं को अच्छा ही मानता है।



(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए। ) 

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