दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । सावधान ! निंदा शत्रुता बढ़ाती है




संकट का सबसे बड़ा कारण है निंदा। निंदा के समानार्थी शब्द हैं बुराई करना, दोष निकालना, दोष दर्शन, नुक्स निकालना, मीन मेख निकालना, आलोचना आदि। सभी प्रकार की हिंसा की जड़ में निंदा का कुछ न कुछ योगदान होता है। वैयक्तिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विपदाओं की उत्पत्ति का मूल कारण निंदा है।


निंदा शत्रुता बढ़ाती है। शत्रुता हर रूप में पीड़ावर्धक है। इसीलिए निंदा निंदनीय है। निंदा करना संकट को बुलाने का निमंत्रण पत्र है। निंदा स्तुति से हानि ही होगी। बोलकर निंदा करना उतना हानि नहीं पहुँचाती जितना की लिखकर की गई निंदा हानि पहुँचाती है। समाचार पत्रों में अधिकांश बातें मिथ्या आलोचना की होती हैं। आरोप-प्रत्यारोप निंदा के ही विविध रूप हैं। दुर्भावनावश निंदा करना और अच्छी भावना से निंदा करने में बड़ा फर्क होता है।

 

हमारे देश में निंदा लेख और अपमान लेख या अपयश दोनों ही मानहानि के प्रकार हैं। जब एक व्यक्ति गलत इरादे से किसी पर लांछन लगाता है और जिस पर लांछन लगाया हैउससे उसकी ख्याति का हनन होपरिवार के लोगों की भावनाएं आहत हो तो यह मानहानि के दायरे में आता है। सैकड़ों मुकदमे अदालतों में लंबित हैं और लोग अदालतों का चक्कर काट कर तन, मन, धन और जीवन की हानि कर रहे हैं। निंदा किसी को पसंद नहीं होती है।


निंदा करने से शत्रुता पनपती है और कठिनाइयाँ स्वयं ही चली आएँगी। संकट याने ऐसी कोई बात या घटना जिसका निवारण करना मुश्किल हो जाय और किसी की सहायता लेना अनिवार्य हो जाय। निंदा किन परिस्थितियों में उत्पन्न होती है। अभिमान, दर्प, घमंड, मिथ्या अहंकार आदि के आने पर मन को बुराई करने की प्रेरणा मिलती है। आलोचना करने से तन, मन और धन का ह्रास होता है, हानि होती है। इसीलिए नुक्स निकालने वाले संकटों से घिरे रहते हैं। जो जितना नुक्स निकालेगा वह उतना अधिक अभावों एवं पीड़ा से ग्रस्त रहेगा। 

 

दोष दर्शन दुःख बढ़ाता है। निंदा का उदय द्वेष और दुर्भावना रखने के कारण होता है। कोई संकट आया है तो समझना चाहिए कि यह आगंतुक है और इसका संबंध विरोध, प्रतिरोध, प्रतिशोध और द्वेष, दोष दर्शन आदि भावना से है। जितनी अधिक मात्रा में द्वेष और दोष दर्शन होंगे उतने ही अधिक आकार में में विपत्ति छोटा-बड़ा होगा। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि जिसके मन में जितनी अधिक गंदगी होगी, वह उतनी अधिक मीन मेख निकालने के लिए उतावला रहेगा।

 

किसी में दोष दर्शन करके उसकी आलोचना करना सामान्य तौर किसी को पसंद नहीं आती। निंदा करने से समक्ष व्यक्ति का अपमान होता है। मान-प्रतिष्ठा में कमी होना किसी को अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए ऐसा काम क्यों किया जाय जिससे कि किसी की प्रतिष्ठा, मान-मर्यादा आहत हो। कुछ बिरले ही ऊँचे किस्म के लोग होते हैं, जो अपनी आलोचना सुनकर विचलित नहीं और अपनी कमी का सुधार करते हैं। प्रशंसात्मक आलोचना करने का अभ्यास कीजिए। 


जिस तरह निंदा दिलों को आहत करती है वैसे ही प्रशंसा प्रसन्नता बढ़ती है। वाणी और भावनाओं पर संयम रखिए। सुधार और हितकर भावना रखकर ही आलोचना कीजिए, लेकिन सजग रहिए। सावधान रहिए, आपसे भी अधिक बलशाली लोग समाज में हैं। वैमनस्य न बढ़ाना भी समाज की महान सेवा है। किसी महापुरुष ने सुझाव दिया है कि तब तक किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहिए, जब तक विवाद में पड़ना ही आखिरी रास्ता न हो। 


(रुसेन कुमार, उद्यमी, पत्रकार एवं  लेखक हैं। उनके चिंतन दैनिक अखबारों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।)


(प्रकाशन की शर्तः इस लेख को किसी अखबार या वेब माध्यमों द्वारा प्रकाशित करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। प्रकाशन का अनुरोध rusenk@indiacsr.in पर भेजा जा सकता है।)



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