आज का चिंतनः रुसेन कुमार। कई मनुष्यों का जोड़ है एक मनुष्य
मृत्यु का शोक सबसे बड़ा है। जितना अधिक लगाव रहेगा, उनके बिछड़ने पर उतना ही अधिक शोक होता है। हमारा उनसे अधिक अपनत्व रहता है जिन्होंने हमारे लिए कुछ अच्छा किया हुआ होता है और प्रगति में सहयोग दिया हुआ होता है। दूर किसी प्रदेशों में हो या निकट किसी प्रिय जन, रिश्तेदार की मृत्यु होने पर हमें गहरे दुःख का अनुभव होता है। मनुष्य का अनिवार्य स्वभाव है दुःख की अनुभूति। किसी से सदा के लिए बिछड़ने का दुःख होना स्वाभाविक है, लेकिन इसका वास्तविक कारण क्या है।
वास्तव में, मनुष्य का जीवन सामाजिक वस्तु है। जीवन भर हमें लोगों से मिलना-जुलना पड़ता है। मेल-मिलाप से ही हमारा जीवन सुचारू रूप से चलता है। जिसका जितना अधिक मानवीय सम्पर्क होगा, सामाजिक जीवन उतना अधिक सफल होगा। हम जिनसे भी मिलते हैं, उन व्यक्ति का एक हिस्सा हमारे भीतर समा जाता है। हम जिनसे भी मिले हुए हैं, उनका एक अंग हमारे भीतर जीवित रहता है। हम जिनसे भी मिलते हैं उनके साथ विचारों तथा भावनाओं का आदान-प्रदान होता है। उनकी बातें, यादें, विचार, स्पर्श, भावनाएँ हमारे भीतर जमा रहती हैं। जब कोई बिछड़ जाता है तो हमारे पास उनकी यादें हमें विचलित करती हैं।
इसी तरह की बातें उधर भी रहती हैं। जिस तरह उनकी यादें हमारे पास हैं, वैसे ही हमारी यादें भी उनके पास थीं। मृत्यु होने पर हमारा एक अंश भी उनके साथ सदा के लिए चला जाता है, वास्तव में इसी बात का हमें दुःख रहता है। जब एक मनुष्य का अंत होता है तो उसमें विद्यमान सैकड़ों मनुष्य के अंश का अंत हो जाता है। कई मनुष्यों के जोड़ के औसत से एक नया मनुष्य बनता है। एक मनुष्य के भीतर कई मनुष्य समाए हुए रहते हैं। मनुष्य का जीवन साझा है, निजी नहीं है।
धरती की आयु की तुलना में मनुष्य का जीवन और उसकी आयु रेत के एक कण के हजार टुकड़े से भी छोटा है। मनुष्य की आयु किसी भी पदार्थ की तुलना में भी बहुत अल्प है। जीवन अत्यंत ही अल्प और क्षणभंगुर है, फिर भी मनुष्यों को कम से कम 100 की आयु तक जीने की इच्छा रखनी चाहिए और उसकी आयु 100 वर्ष तक बनी रहे, इसके लिए उसे शास्त्र सम्मत, कर्तव्य पूर्वक, कर्तव्य कर्मों का आचरण करते हुए, अनुशासित जीवन जीने का भरपूर प्रयत्न करना चाहिए, ऐसा शास्त्रों में वर्णन मिलता है।
मृत्यु को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है - स्वाभाविक मृत्यु, अकाल मृत्यु और आपदाकारित मृत्यु। कोरोना महामारी से मृत्यु आपदाकारित मृत्यु है। मनुष्य प्रकृति से परे नहीं है। वह प्रकृति की गतिविधियों से अच्छे और बुरे दोनों ही तरीकों से प्रभावित होता है। बिजली गिर जाने से, महामारी से, सुनामी आ जाने से, भूकंप आ जाने से तथा तूफान आ जाने से जीवन को गंभीर रूप से खतरा उत्पन्न हो जाता है और ऐसी परिस्थितियों में जीवन को बचाना लगभग असंभव ही होता है।
वैसे तो मनुष्य का शरीर प्रत्येक क्षण नष्ट हो रहा है और भोजन के द्वारा प्राप्त रस के कारण वह अंगों में नए अवयवों का निर्माण करते रहता है। शरीर प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है और नवीन है, लेकिन कुल रूप में प्रति क्षण काल की ओर अग्रसर हो रहा है।
जन्म लेकर फिर किसी दिन अंत हो जाना शरीर का स्वभाव है। कर्मों के द्वारा मनुष्य अपनी आयु को घटा सकता है और बढ़ा भी सकता है। वैसे तो मानव देह व्याधियों का, रोगों का घर है। जीना और मरना हमारे हाथ में नहीं है लेकिन जीवन हमारे हाथ में है। जीवन की सुरक्षा हो, उसका उपाय करना ही होगा। आइए, जीवन की रक्षा का हर संभव उपाय करें।
(प्रकाशन की शर्तः इस लेख को किसी अखबार या वेब माध्यमों द्वारा प्रकाशित करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। प्रकाशन का अनुरोध rusenk@indiacsr.in पर भेजा जा सकता है।)



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