दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । अपनी भलाई अपने ही हाथ
हमारे समय की सबसे बड़ी खोज यह है कि हम अपने मन के अंदरूनी भावों को उन्नत बनाकर, सजाकर, संवारकर बाहरी दुनिया को ज्यादा रचनात्मक और मनभावन बना सकते हैं।
अपने आपको बुराइयों से बचाकर रखना ही वास्तविक भलाई है। यह तभी संभव हो सकता है यदि स्वयं को एक महत्वपूर्ण व्यक्ति मानेंगे। कैसे भी हो, लेकिन बुराई के रास्ते पर मत चलिए। बुराई छू न पाए, उसका इंतजाम करके रखिए। सावधान रहिए ताकि अपने-आपको बुराई से बचाने का सतत उपाय हो सके। अपनी भलाई अपने ही हाथ में है। अपनी भलाई के काम को अपने ही हाथ में रखिए।
कोई भलाई करने आएगा ऐसा समझ कर प्रतीक्षारत मत रहिए, मूल्यवान समय को मत गंवाइए। विरले लोग ही दूसरों की सहायता करते हैं। परिस्थिति कठिन होने पर भी बचे रहना संभव है। दृढ़ निश्चय और सावधानी की आवश्यकता तो रहती ही है। क्या आप नहीं चाहेंगे कि आपके द्वारा सबकी भलाई हो जाय, तो क्या यह आवश्यक नहीं कि इसकी शुरुआत आप स्वयं से करें। भलाई का आनंद पहले स्वयं ही उठाएँ। वास्तविक भलाई के लिए अपनी खुशी के बजाय अपने कर्तव्य पालन पर जोर लगाना चाहिए।
किसी को दुःख पहुँचाने की कोशिश करने की भूल न कीजिए। किसी बुराई के लिए दूसरों को सजा देने का उद्यम न हो। किसी को दुखाने के लिए और दूसरों को सजा देने का विचार न कीजिए। किसी को दुःख देकर सुख का अनुभव मिले तो समझना चाहिए कि हमारे भीतर कोई महान गड़बड़ी प्रवेश कर चुकी है। किसी को दण्ड मिले यह विचार बहुत विध्वंसक है।
दण्ड से बुराई घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है। दण्ड हिंसा ही है। अपराधों का निवारण होता है विचार परिवर्तन से, हृदय परिवर्तन से। इसका उपाय है महान विचारों का सानिध्य का मिलना। वास्तव में हम अपनी भलाई चाहते हैं तो जितनी जल्दी हो सके हमें हृदय में दया और प्रेम भर लेना चाहिए, उदारता बढ़ानी चाहिए। उदण्ड न बनिए वरना आपको कोई आपकी उदण्डता के लिए दण्डित कर देगा। अपने को बलशाली समझने का भ्रम मत पालिए। विवाद की स्थिति में अपने को सबसे कमजोर मानिए ताकि आपको अनावश्यक के झंझटों से मुक्ति मिली रहे। जब तक आप स्वयं नहीं सुधरेंगे भलाई बाधित रहेगी।
भलाई इसी में है कि अपनी भलाई का ही प्रयत्न कीजिए। अपनी भलाई करने के अतिरिक्त कोई कार्य श्रेष्ठ नहीं है। अपनी भलाई के अतिरिक्त, अपने को संवारने के अतिरिक्त कुछ भी अधिक न कीजिए। दूसरों के मामलों में हस्तक्षेप करने का विचार मन में लाइये ही मत। दुनियादारी छोड़िए और अपने काम में लगिये – स्वयं को सुधारने के काम में। अपने भीतर प्रेम की मात्रा को बढ़ाइए। किसी बात को शब्दों से साबित करने के बजाय कर्म द्वारा उसका प्रदर्शन कीजिए। आपकी भलाई सुनिश्चित है। अच्छा समय आएगा नहीं, बल्कि आया ही हुआ है।
(रुसेन कुमार, उद्यमी, पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके चिंतन दैनिक अखबारों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।)
(प्रकाशन की शर्तः इस लेख को किसी अखबार या वेब माध्यमों द्वारा प्रकाशित करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। प्रकाशन का अनुरोध rusenk@indiacsr.in पर भेजा जा सकता है।)



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