व्यंग्यः रुसेन कुमार । मीठे लोगों का देस




बहुत मीठा है हमारा देश। मीठा, मिठाई, मिठास और मीठापन इसकी पहचान है। मीठा इस आशय में कि यहाँ मिठाइयों की भरमार है। हर 10 किलोमीटर में मिठाई के स्वरूप बदल जाते हैं। हर जाति, समुदाय, समाज की अपनी - अपनी मिठाइयाँ है। एक की मिठाई दूसरे को पसंद तो आती है लेकिन वे उसे खाते नहीं है। हमारे जाति की मिठाई में जो मजा है वह तुम्हारे में कहाँ ! इसीलिए तो सभी ने अपनी जाति के लिए अलग मिठाइयाँ इजाद कर रखे हैं। मिठाई सेवन से एक अलग ही प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है। आँखें बंद हो जाती हैं और असीम तृप्ति का अनुभव होता है। जो मिठाई न खाए वह तो अभागा ही है।

हमारे देश में जैसे 3000 से अधिक जातियाँ हैं, वैसे ही मिठाइयाँ हैं। मजाल है कि सबके स्वाद एक जैसे हों। अपने जाति की मिठाई होना समाज में बहुत गर्व की बात मानी जाती है। वैसे सैकड़ों किस्म की मिठाइयाँ पायी जाती हैं लेकिन हमें उसी मिठाइयों को खाकर तृप्ति मिलती है, जो हमारे जाति के हैं। हर मिठाई के अपने विशिष्ट स्वाद, रंग, रूप, स्वरूप और रस होते हैं। वैसे तो हमारे देश में मिठाई की विविधता ही लोगों के आचार-व्यवहार की भिन्नता का पैमाना है। मिठाई का नाम लेती है, उसे पसंद करने वाले लोगों की बोली और समुदाय का भलीभाँति परिचय भी मिल जाता है।

पेठा, बेसन के लड्डू, गाजर का हलवा, रसगुल्ला, गुलाब जामुन, जलेबी, कलाकंद, खोपरा, पाक, खीर, नानखटाई, 100 तरह के पेड़ें, काजू कतली, रसमलाई, चमचम, सोहन हलवा, बूंदी, बरफी, 50 तरह के श्रीखंड, पूरण पोली, आम रस, दुधि हलवा, खीर, गोल पापड़ी, सोन पापड़ी, खोवा, बरफी, मोहन थाल, सक्कर, पारा, तिलगुड़ के लड्डू, मुम्बई आइस हलवा, चीकू बर्फी, चूरमा लड्डू, घेबर, घुघरा, 50 तरह के हलवा, तील के लड्डू, सोंठ के लड्डू, खजूर पाक, मगज पाक, रेवड़ी वगैरह-वगैरह लिखते-लिखते हाथ थक जाय लेकिन मिठाइयों के नाम पूरे नहीं होंगे। लोगों को लुभाने के लिए हर वर्ष भारत में नई किस्म की मिठाई विकसित की जाती है। औषधीय गुणों से युक्त अनेक-अनेक प्रकार के सरबत हैं। उनका नाम लिखें तो लिखते-लिखते सुबह से शाम हो जाय। देखिए, मिठाई की बात का स्मरण कर आपके भी मुंह में पानी आने लगा है, लेकिन धैर्य रखिए यह चिंतन का समय है।

भारतीय मिठाइयों की गाथा लिखने के लिए धैर्य, बुद्धि, समझ चाहिए, साहस चाहिए। तब कहीं जाकर मिठाई की महिमा लिखने में न्याय किया जा सकेगा। वनवासियों से लेकर आधुनिक मानव तक सभी में मिठाई उनके उत्सवों की अनिवार्य जरूरत है। भारत सब कुछ छोड़ सकता है लेकिन मिठाई खाना नहीं छोड़ सकता। हरि अनंत - हरिकथा अनंता की भाँति ही मिठाई की कथा भी अनंत है। जितना भी लिखा जाय, कम ही लगेगी। कहीं कोई कमी रह जाय तो लोग कहेंगे कि भाई हमारी मिठाई के बारे में नहीं लिखा। उनकी मिठाई पर न लिखो तो अपना तोहीन समझेंगे। हमारी मिठाई में क्या कमी है कि उसके बारे में दो शब्द नहीं लिखे गए। सचमुच में मिठाइयों पर लिखना बहुत जोखिम का कार्य है। लोग नाराज हो जाएँगे तो भलाबुरा कहेंगे। लोग आक्षेप लगाने से नहीं चुकेंगे और कहेंगे देखो अपनी ही जाति की मिठाई को श्रेष्ठ बता रहा है। यदि हर किसी की बातों का परवाह करते रहें तो लिख ही नहीं पाएँगे मिठाई पर। तो हमने यह सोचा कि कोई कुछ भी कहे, लिखकर ही दम लेंगे आज।

भारत शुद्ध ताजी मिठाइयों का देश है। मीठा के बगैर भारत चार दिन भी नहीं जी सकेगा।  सब कुछ त्यागा जा सकता है लेकिन मिठाई त्याज्य नहीं है। चाय में मिठास कम हो जाय तो कलह मच जाती है। हमारे समाज में लोग मिठाई बनाने के साथ-साथ खाने और खिलाने भी अव्वल रहते हैं।। हाथों से बनी मिठाई की अवहेलना करना अभद्रता मानी जाती है। त्योहारों पर किसी के द्वार पर जाइये, मिठाई चटाकर ही भेजेंगे। इस देश में मिठाई एक ऊँचे किस्म का शिष्टाचार है। मिठाई में ही आदर और सद्भाव मिलाकर घर आए मेहमानों का सत्कार कर दिया जाता है। मिठाई को अपनत्व के रंगीन डिब्बे में लपेट करके उपहार के रूप में दिया जाता है। वाह ! कैसी महान परम्परा है इस देश की।

इधर हमारा दुर्भाग्य देखिए। जिसके यहाँ सैकड़ों तरह की ताजी पौष्टिक, स्वादिष्ट मिठाइयों के बाजार बारो महीने सजे रहते हैं, वहाँ तरह-तरह के केमिकल युक्त बनावटी चॉकलेट धड़ल्ले से बिकते हैं। केवल बिकते ही नहीं बल्कि उनका संगठित कारोबार कई सौ करोड़ रुपये का है। कुछ मीठा हो जाय - ऐसा कह कर यह चार शब्द ही हमारे करोड़ों रुपये ऐठ लेते हैं। उनकी एक टुकड़े मिठाई की कीमत में हमारे पूरे घर के लिए मिठाई बन जाया करती है। लेकिन हमारी बुद्धि का पतन देखिए हमारे बच्चे उसी बनावटी मिठाई को खाने के लिए माता-पिता की जान खा जाते हैं। उनकी मिठाई से ज्यादा मीठा उसका विज्ञापन होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ विज्ञापन की जाल में फंसा कर हमारे बच्चों के कोमल मन को भावुक बना करके चॉकलेट और कोल ड्रिंक्स के गुलाम बना रहे हैं।

विडम्बना यह भी है पौष्टिक सरबत को छोड़कर हानिकारक आधुनिक डिब्बा बंद जहरीले पेय को ही पीने की जिद करेंगे। वास्तव में हम लोग दिन-ब-दिन मीठास के अधीन हुए जा रहे हैं। अधीनता हमारी नशों में घुसे जा रही है। मीठा है यह कहकर कोई भी हमें कुछ भी पदार्थ बेचे जा रहा है। वास्तव में हम मिठा आसक्त लोग हैं। स्वाद की गुलामी सबसे बड़ी है। जिव्हा बहुत शक्तिशाली ज्ञानेंद्रिय है, जिस पर नियंत्रण पाना संभव नहीं है। मिठास का संबंध रसना से है। कुछ घटनाओं को देखकर कभी-कभी तो लगता है कि मिठाई के कारण ही कड़वाहट बढ़ रही है। यही समस्याओं की जड़ है।

दुकानों में शुद्ध मिठाई की उम्मीद न कीजिए। मिलावट के बिना अति शुद्ध मिठाई दुर्लभ है। भला कोई दुकानदार शुद्ध क्यों बनाए। शुद्ध मिठाई बनाना बहुत महंगा सौदा। जैसे ईमानदार हर कहीं नहीं मिलती वैसे ही आज पक्के हलवाई के हाथों की मिठाई का अकाल है। दीवाली के समय यह खबर आम रहती है कि अमुक दुकान में नकली मिठाई पकड़ाई। शुद्ध मिठाई बनाने के लिए संसाधन और हुनर चाहिए। गरीब लोग की भलाई देखिये वे अपनी मिठाई खुद ही बनाते हैं, ताकि वे मिलावट का डटकर मुकाबला कर सकें। मिठाई के मामले में उनकी आत्मनिर्भरता सचमुच अतुलनीय है। मिठाई में गुणवत्ता राष्ट्रीय बहस का मुद्दा नहीं है, इसकी पीड़ा खाये जाती है।

भोजन के बाद मिठाई क्यों खाई जाय, इसकी परंपरा कब से चली आ रही है, किन महापुरुषों ने अवधारणा प्रस्तुत की होगी, सचमुच यह रहस्यमयी बात है। मिठाई की आलोचना मतलब लोगों के स्वाद की आलोचना। मिठाई की आलोचना करके लोगों की भावनाओं को आहत करना निंदनीय है, तो ऐसा करके हम अपनी फजीहत क्यों करें। यह मुझसे नहीं हो पाएगा। मिठाई जीवित रहे, इसका हर संभव प्रयास होना ही चाहिए। मिठाई कितनी भी भली-बुरी हो, लेकिन मीठापन तो बढ़ना ही चाहिए। जीवन को बढ़ाने के लिए मिठास जरूरी है। मिठाई को बचाना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए।

अभी तक ऐसी किसी मिठाई का निर्माण नहीं किया जा सका है जो सभी जाति, सम्प्रदाय और धर्म के लोगों को जोड़ दे और उनमें मिठास घोल दे। यदि ऐसा कोई शोधार्थी निर्माता मिल जाय तो यह मानव सभ्यता पर महान उपकार होगा।

वैसे आपको यह बताना मेरा उत्तरदायित्व है कि एक रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है कि हमारे देश में वर्ष 2025 तक मधुमेह रोगियों की संख्या बढ़कर 13.4 करोड़ हो जाएगी। हमारा देश दुनिया का दूसरा बड़ा चीनी उत्पादक है। अनुमान है कि वर्ष 2020-21 में हम लोग 310 लाख टन शक्कर का उत्पादन कर लेंगे। चीनी की 35 प्रतिशत खपत घरेलू उपयोग में होती है जबकि 65 प्रतिशत खपत थोक, व्यावसायिक उत्पादों- मिठाइयों, चॉकलेट, आइसक्रीम, पेय पदार्थों को बनाने में या संस्थानों, भोजनालयों, होटलों, कार्यालयों में होती है। जनसंख्या वृद्धि और शहरी आबादी बढ़ने से तेजी से चीनी का उपभोग बढ़ रहा है।

मैं कोई डॉक्टर तो नहीं लेकिन इतना तो बता ही सकता हूँ कि मधुमेह एक असाध्य रोग है जिसमें शरीर या तो रक्त शर्करा नियंत्रित करने वाले हार्मोन इंसुलिन के निर्माण में अक्षम हो जाता है, या उसका कुशलता से इस्तेमाल नहीं कर पाता है। अधिक मीठा का सेवन और असंतुलित जीवन शैली रोजाना लाखों लोगों का जीवन छीन रही है। लोगों में, विशेषकर शहरी बच्चों में जिस हिसाब से चॉकलेट, आइसक्रीम आदि मीठा खाने का चलन और आमजनों में मधुमेह फैल रहा है, उसी अनुपात में लोगों के व्यवहार और जुबान में मीठापन आए तो इसमें बुराई ही क्या है।

बाजार का खेल देखिए जिस हिसाब से लोगों में कड़वाहट बढ़ रही है उसी के हिसाब से हर वर्ष नए किस्म की मिठाइयाँ विकसित हो रही हैं। कड़वे लोगों को मिठाइयाँ बहुत प्रिय होते हैं। जो जितना अधिक कड़वा होगा, वह उतना ही अधिक मिठाई का पुजारी होगा। जिस व्यक्ति में विशेष किस्म की मिठाई की पसंदगी होगी, उसी तरह इसमें नई किस्म की विशेष कड़वाहट पैदा होने की गुंजाइश रहेगी। वास्तव में मिठाई तो कड़वाहट का इलाज है, दवा है। मानव जाति पर मिठाई का महान उपकार होगा अगर वह आचरण में घुलमिल माधुर्य पैदा कर दे।

सच मानिए तो जीवन में मीठापन और कड़वाहट एक सिक्के के दो पहलू हैं। एक तराजू लीजिए एक तरफ कड़वाहट को रखिए और दूसरे में मीठापन। अपने मीठापन और कड़वाहट को खुद ही तौल लीजिए।

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(रुसेन कुमार, उद्यमी, पत्रकार एवं  लेखक हैं। उनके चिंतन दैनिक अखबारों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।)

(प्रकाशन की शर्तः इस लेख को किसी अखबार या वेब माध्यमों द्वारा प्रकाशित करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। प्रकाशन का अनुरोध rusenk@indiacsr.in पर भेजा जा सकता है।)

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