रुसेन कुमारः विचार-विमर्श और आलोचना ही राष्ट्र को गतिशील बनाता है
30 अप्रैल 2021 को भारत के सर्वोच्च अदालत ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के योगी आदित्यनाथ नेतृत्व वाली उत्तरप्रदेश सरकार को डांटते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर कोरोना महामारी में ऑक्सीजन, बेड, वेंटिलेटर या अन्य स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की शिकायत गलत नहीं है और इसे किसी भी हालत में दबाया नहीं जाना चाहिए।
अदालत ने केंद्र, राज्यों और सभी पुलिस महानिदेशकों को निर्देश दिया कि वे ऐसे किसी भी व्यक्ति पर अफवाह फैलाने के आरोप पर कोई कार्रवाई नहीं करें जो इंटरनेट पर आक्सीजन, बिस्तर और डाक्टरों की कमी संबंधी पोस्ट कर रहे हैं।
न्यायाधीश ने कहा एक नागरिक और एक जज के तौर पर ये मेरे लिए चिंता का विषय है। अगर कोई नागरिक सोशल मीडिया पर अपनी शिकायत रखता है तो हम नहीं चाहते कि इस जानकारी को दबाया जाए। हम तक ये आवाजें आने दीजिए। ये नहीं मान लेना चाहिए कि सोशल मीडिया पर उठाई गई शिकायतें झूठी हैं। किसी नागरिक को बेड या ऑक्सीजन चाहिए और उसे प्रताड़ित होना पड़ता है तो हम इसे अदालत की अवमानना मानेंगे।
यह पहला मौका नहीं है जब अदालत को सरकार के कामकाज पर इस तरह की कटु आलोचना करनी पड़ी हो। तब से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारों की व्यवस्थाओं पर अनेक बार आलोचना, सुझाव और निर्णय दिए गए हैं। ऐसी बातें अदालतों को बार-बार क्यों कहनी पड़ती है, यह हर भारतीय के लिए विचारणीय विषय है। उससे बढ़कर यह सोचनीय बात है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकारें अपनी ही लोगों की आवाजों और पीड़ा को दमित करने का दुस्साहस कैसे करती हैं? कुछ ज्वलंत प्रश्न हैं - सरकारें जन आलोचनाओं से क्यों डरती हैं? सरकारों को जन आलोचनाओं से क्यों डरना चाहिए? सरकार और प्रशासन में कौन लोग हैं जिन्हें विचारों, सुझावों और आलोचनाओं से भय रहता है?
कोरोना महामारी और क्रमबद्ध तालाबंदी ने देश में प्रशासनिक अदक्षता, अक्षमता, उदासीनता और कुप्रबंधन को बुरी तरह उजागर कर दिया है। संकट के समय में ही राष्ट्र की प्रगति की परीक्षा होती है। आपदा के समय में भारत सभी दृष्टिकोणों से असफल होता हुआ दिखाई दे रहा है। कोरोना आपदा और तालाबंदी से उत्पन्न हुई हालातों को संभालने में हमारी सरकारें इतना असहाय क्यों दिखाई दे रहा है, यह अत्यंत विचारणी प्रश्न है।
भारत में करोड़ों लोग आज भी अस्पताल नहीं जाते। वे अस्पताल नहीं जाना चाहते, क्योंकि इलाज पाना बहुल जटिल है। भारत के अस्पतालों में नागरिकों का भयंकर अपमान किया जाता है। भारत के अस्पताल एक तरह के लूट के केंद्र बन गए हैं। चिकित्सा सुविधाओं का लाभ लेने के लिए लोगों को अपनी सम्पत्ति को गिरवी तक रखनी पड़ती है।
मोटे तौर पर एक साधारण आदमी जब भी कुछ कहेगा तो वह अपनी वाणी से केवल और केवल अपनी पीड़ा और आहत भावनाओं को ही अभिव्यक्त करेगा। यदि किसी व्यक्ति से बोलने की आजादी छिन ली जाय तो उस मनुष्य की गरिमा ही समाप्त हो जाएगी। दुनिया में हजारों बोलियाँ और भाषाएँ इसका प्रमाण हैं कि मनुष्य बोले बिना एक दिन भी नहीं रह सकता। जो सुन सकता है, वह बोलेगा ही। जो देख सकता है, उसके मन में हलचल मचती ही है।
किसी भी परिस्थिति में मनुष्य के इन 13 चीजों को नहीं छिना जा सकता - सांस लेना, बोलना, सुनना, देखना, चलना, स्पर्श करना, जानना, मानना, विचारना, कल्पना करना, शौच करना, भोजन ग्रहण, सूंघना आदि। यह क्रियाएँ मनुष्य को जीन के लिए आवश्यक हैं। इन क्रियाओं को बाधित करने का अधिकार किसी को भी नहीं है और न हीं किसी को होना चाहिए। इन क्रियाओं का अवरोध करने पर मनुष्य का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा अर्थात् उसका जीवन छिन जाएगा। जीवन की रक्षा करना सबसे बड़ा कार्य है। अनेक वैज्ञानिक शोधों और दैनिक प्रमाणों से यह प्रमाणित हो चुका है कि यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक बोलने से रोक दिया जाय तो वह मानसिक रोगों से ग्रसित हो जाएगा।
अतः किसी भी आदमी की अभिव्यक्ति या सामूहिक अभिव्यक्ति को रोका नहीं जाना चाहिए। इन बातों को ठीक तरह से समझना होगा। आदमी बोलने के पहले उसे अपने मन में विचार करता है। यानी बोलने के पहले सोचना पड़ता है। पहले सोचेगा फिर बोलेगा। सोचने की प्रक्रिया के बिना बोला नहीं जा सकता। सोचना भी एक जटिल प्रक्रिया है। सोचने की प्रक्रिया में मन को चित्रण करना पड़ता है। मनुष्य की सोचने की प्रक्रिया को किसी भी माध्यमों द्वारा रोका नहीं जा सकता क्योंकि मनुष्य सोते समय भी सपने देखता है। नींद की अवस्था में भी मनुष्य के मन की भीतरी अवस्थाएं क्रियाशील रहती हैं।
कोई भी जिंदा मनुष्य सोचे बगैर रह ही नहीं सकता। सोचेगा उस बात को बोलना भी पड़ेगा, अभिव्यक्त करना ही पड़ेगा। सोचना, बोलना और अभिव्यक्त करना सब आपस में जुड़े हुए कार्य हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति को बोलने से रोका नहीं जा सकता। यह असंभव काम है। जो कोई भी किसी की अभिव्यक्ति को दबातें हैं या दमित करने का विचार लाते हैं, या नियोजित करते हैं, उनके पीछे उनकी कुछ और मंशा होती है। विज्ञान के इस उन्नत युग में शिक्षा का अत्यधिक प्रसार होने के कारण किसी भी व्यक्ति की अभिव्यक्ति को दमित नहीं किया जा सकता।
थोड़ी और चर्चा की जाय। आज हमारे समाज में अभिव्यक्ति को दमित करने की बात आती है, उसका क्या कारण होता है। इस पर विचार करना जरूरी है। अभिव्यक्ति और व्यवस्था दोनों अलग-अलग बातें हैं। कोई भी व्यवस्था मनुष्य की अभिव्यक्ति को दमित नहीं कर सकती। अभिव्यक्ति मानव निर्मित नहीं है। अभिव्यक्ति प्रकृति प्रदत्त है। जबकि व्यवस्थाएँ मानव निर्मित हैं। मनुष्य के सभी काम बोलने से ही चलता है। व्यवस्था मनुष्यों की सुविधा के लिए है। व्यवस्था के लिए मनुष्य नहीं है।
यद्यपि मनुष्य व्यवस्था बनाता है लेकिन वह किसी व्यवस्था के अधीन नहीं है। मनुष्य ही समाज और राष्ट्र की इकाई है, कोई भी व्यवस्था समाज या राष्ट्र की इकाई नहीं बन सकती । मनुष्य एक स्वतंत्र प्राणी है। उसकी आजादी को किसी भी अवस्था या व्यवस्था के अंतर्गत बाधित नहीं किया जा सकता। विचार-विमर्श, चर्चा-परिचर्चा और आलोचना ही राष्ट्र को गतिशील बनाते हैं।
किसी बात का भय दिखा कर व्यक्ति या समूह को बोलने के लिए रोका जाय तो इससे सामाजिक गूँगापन बढ़ने का खतरा तो रहता ही है। कोई भी व्यक्ति अपने लिए मूक समाज का निर्माण करना नहीं चाहेगा। कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता कि उसकी संतानों के पास बोलने की क्षमता न हों। यह कितनी खराब प्रवृत्ति है कि भारत में आज भी एक वर्ग है जो लोगों की अभिव्यक्ति को प्रभावित करना चाहता है।
यह सदैव स्मरण रखने योग्य है कि कोई भी व्यवस्था नागिरकों की सुविधा के लिए है। यदि कोई व्यवस्था किसी भी नागरिक के लिए विधिसम्मत न होकर असुविधा उत्पन्न करता है तो ऐसी व्यवस्था परिवर्तनशील होती है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि आज के समय में सारा काम व्यवस्था से ही चलता है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में हर दिन व्यवस्था में उन्नतिकरण चाहिए।
वास्तव में, व्यवस्था में उदासीन लोगों के आधिपत्य होने से स्वाभाविक रूप से अव्यवस्था उत्पन्न होती है। इस समझ को दृढ़ करना होगा कि व्यवस्था उन्नत न हो तो राष्ट्र का काम-काज बिड़ता है, असुविधा होती है। व्यवस्था में निरंतर सुधार करना नेतृत्वकर्ताओं का प्रमुख काम है। व्यवस्था को ठीक से संचालित नहीं कर पाने के कारण हमारा देश गंभीर परिस्थितियों का सामना कर रहा है। व्यवस्था के कुशल संचालन के लिए नेतृत्वकर्ताओं और नीति निर्धारकों में भेदभाव रहित भावना का होना आवश्यक है।
मेरा तो स्पष्ट मानना है कि लोकतंत्र विचार-विमर्श और आलोचनाओं के द्वारा ही संचालित रहता है। विचार विमर्श करके ही समाज की समस्याओं के मूल कारणों को समझा जा सकता है।
यदि लोकतंत्र में विचार-विमर्श और आलोचना की व्यवस्था न हो तो यह सामंतवाद के समकक्ष है। इसे हमें अच्छी तरह से समझना होगा कि समाज और राष्ट्र विचार-विमर्श के द्वारा ही गतिशील बनता है। नवीन विचारों के समावेश और आलोचना के बिना कोई भी राष्ट्र समर्थ और गतिशील नहीं हो सकता। विचार-विमर्श ही लोकतंत्र की प्राण शक्ति है। नागरिक अपने राज्य की व्यवस्था पर आलोचना के द्वारा ही निगरानी करता है। लोकतंत्र नागरिकों की सुरक्षा और सम्पन्नता की व्यवस्था के लिए है।
मूल बात यह है कि जरूरत पड़ने पर जो सरकार अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा नहीं करता वह राष्ट्र आगे कैसे प्रगति करेगा? कोरोना महामारी से उत्पन्न अव्यवस्था को ठीक से संभाल नहीं पाने के कारण राज्य और सरकार तथा प्रबंधकों की कटु आलोचना हो रही है। यह भी तथ्य है कि व्यक्ति, समाज हो या संस्था किसी को भी अपनी आलोचना सुनना पसंद नहीं होता। यदि हम आलोचना को नहीं सुनेंगे तो समाज जटिल हो जाएगा। आलोचकों की बातों को बड़े ध्यान से सुनकर कारणों को समझना चाहिए।
संक्षेप में, अभिव्यक्ति की आजादी भारतीय संविधान का प्रमुख आकर्षण है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दमित रहने से वर्गभेद पनपने का डर रहता है। देखा गया है कि पद के अभिमान के कारण नेता और प्रशासनिक अधिकारीगण स्वयं को सर्वोच्च सत्ता मानने लगते हैं। आपदा के समय में किसी आलोचना से विचलित होने के बजाय ज्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से कार्य करने होंगे। जो उचित आलोचना है उस पर संज्ञान लेना चाहिए और जो अनुचित लगे उसके प्रति उदासीन हो जाना चाहिए।
(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए। )



Comments
Freedom of speech is a fundamental right, under India's constitution. And incidentally, only the human species is capable of speaking and expressing its thoughts, views, and emotions, through its voice using numerous words, speech, and languages.
Banning speech is like banning our other facilities like seeing, hearing, walking, laughing and crying.
We have come to a sad state when almost every day courts have to reprimand state and central govt to carry out their normal, expected tasks.