कविताः रुसेन कुमार । धिक्कार है मुझे
ईश्वर मुझ पर करता क्यों
उपकार इतना
दिया एक और दिन मुझे
ताकि कुछ कर सकूँ
आखिर चाहता क्या है मुझसे वो
एक और दिन रोज दिए जाता है
शर्मिंदा हूँ इसके लिए
इतना अधिक
कि कुछ कर नहीं पाता हूँ
धिक्कार है मुझे
कल के दिन को गंवा दिया
जैसे गंगा जल को नाली में बहा दिया
जैसे घर के एक मात्र घड़े को तोड़ दिया
एक सुंदर फूल को मरोड़ दिया
एक और दिन को कर दिया बर्बाद
धिक्कार है मुझे
कुछ न किया
बस यूँ ही किया बेकार
था समय कितना अनमोल
जान न सका उसका मोल
बहुत कुछ न सही
कर तो सकता था
कुछ न कुछ
पर न कर सका
धिक्कार है मुझे
पन्ने कुछ पढ़ सकता था
लिख सकता था शब्द चार
सीख तो सकता था कुछ न कुछ
टूटा-फूटा गुनगुना सकता था
अनबना सा कुछ बना सकता था
घर को कुछ सजा सकता था
किसी वाद्य को बजा सकता था
पर कुछ न किया
जानबूझकर कुछ न किया
सब गया बेकार
धिक्कार है मुझे।
(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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फोटो स्त्रोतः https://www.inc.com/gordon-tredgold/bad-leaders-focus-on-blame-not-solutions.html




Comments
Painfully honest :).
Bless you Rusen ji.
Regards.
Arun Arora