दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार। दान में त्याग भाव का महत्व है
दुनिया में शक्ति के तीन प्रकार हैं – शारीरिक, बौद्धिक और आर्थिक। जो चीज आपके पास अधिक मात्रा में है उसे अन्यों को बाँटने में कोई बुराई नहीं । दान करने के बारे में एक मान्यता यह भी प्रचलित है कि जो वस्तु आप बाँटंगे हैं वही वस्तु आगे चलकर अधिक मात्रा में मिलती है। हम यहाँ पर धन की उपयोगिता के बारे में बात कर रहे हैं। धन की शक्ति द्वारा उचित अभावों की पूर्ति करना आज के समय की महति आवश्यकता है। धन की उपयोगिता तभी है जब उसे लोगों की सहायता और अत्यंत जरूरतमंदों की सेवा में लगाया जाय।
वैसे तो जीवन जीने के लिए अधिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है, बल्कि जो थोड़ी-बहुत वस्तुएँ हैं, उन्हीं से सबसे अधिक, सबसे सुंदर क्रम-व्यवस्था से काम लेने में भलाई है, उपयोगिता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के हैसियत से सहयोग की भावना रखे। जरूरत पड़ने पर अपने पास उपलब्ध अतिरिक्त संसाधनों को समाज के उपयोग के लिए उपलब्ध कराए। कोरोना महामारी में भारतीयों में परस्पर सहयोग करने की भावना प्रगाढ़ होता हुआ प्रतीत होता है।
दान करने से धन का आदर बढ़ता है। इसलिए सार्वजनिक हित के कार्यों में बढ़-चढ़कर सहयोग करना चाहिए। समाज में आपके आसपास अनेक धनी लोग मिल जाएँगे जो सहयोग और दान के कार्यों में आगे रहते हैं। समाज में ऐसे लोग भी देखने को मिलते हैं जो स्वयं अभावग्रस्त होने के बावजूद विपदा आने पर अपनी जमा पूँजी समाज के काम में दान दे दिया करते हैं।
दान करना सेवा करने का उत्तम विकल्प है। आपातकाल, आपदा एवं विपदा आने पर अनेक लोग परोपकार के कार्यों में निस्वार्थ भाव से जुट जाते हैं। जिस भी माध्यम से, जिस भी विधि से हो सके अधिक सहयोग करने की भावना रखनी ही चाहिए। मानव इतिहास में अनेक दानदाताओं के प्रमाण मिलते हैं। अनेक लोग ऐसे हुए जिन्होंने अपने जीवन, जमीन-जायदाद, श्रम आदि को समाज के उपयोग में लगाया है। आजकल तो अनेक दयालु लोग अपने अंगों को भी दान करके बीमार लोगों के जीवन बचाते हुए देखे जाते हैं। यहाँ तक अनेक युवाओं ने लोगों की सेवा करने के काम को एक सफल व्यवसाय का रूप भी दिया है।
चाहे कारण जो भी हो हमारे समाज में अनेक लोग दीन, हीन, दुःखी और बीमार हैं। कोई अनाथ है तो कोई बेघर है। किसी को तत्काल सहारे की जरूरत है तो किसी तत्काल इलाज की जरूरत है। कोई परिस्थितियों का मारा है तो कोई असमर्थ, असहाय है। ऐसे लोगों पर दान के द्वारा अधिक सहायता, सहयोग और राहत पहुंचाई जानी चाहिए। हमारे देश में दान देने की प्राचीन परम्परा है। दान करके पीड़ित जनों की सेवा की जाती है। दुःखियों और बेजुबान जीवों की सेवा करना प्रत्येक समर्थ व्यक्ति का कर्तव्य है। दान में सेवा एवं सहानुभूति का भाव मिश्रित होता है। अपने पास उपलब्ध ऐसी वस्तुएँ जिसको देने से पीड़ित व्यक्ति को तुरंत सहायता और राहत मिलती है, उसे दान कहते हैं।
दान उत्तम कोटि का भाव है। दान करने से मानसिक संतोष मिलता है। तन, मन, धन तथा इनसे उत्पन्न संसाधनों के दान करने से व्यक्ति की समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है। विद्या दान को श्रेष्ठ माना जाता है। लोगों को जीवन में आगे बढ़ने की युक्ति बताना और उन्नत बुद्धि देकर सहायता करना उत्तम दान है।
दान में त्याग और त्याग की भावना का महत्व है। वस्तु के मूल्य या संख्या का उतना महत्व नहीं है। ऐसी त्याग भावना, जो सुपात्र हैं यानी जिस वस्तु का जिसके पास अभाव है, उसे वह वस्तु देना और उनसे किसी भी प्रकार की कामना नहीं रखा – उत्तम दान है। किसी भूखे को खाना खिलाना और प्यासे को पानी पिलाना दान के ही रूप हैं। दान करने से दोनों पक्ष यानी दान देने वाला और लेने वाला, दोनों ही सुख की अनुभूति करते हैं। दान एक पवित्रम भाव है, न कि वस्तु के आदान-प्रदान की क्रिया। जब भी अवसर मिले सेवा करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान और वस्तु दान सहज होता है। जो लोग जरूरतमंद और दुःखी हैं, उन तक जरूरी वस्तुएँ और सेवाएँ पहुंचाई जानी चाहिए, ताकि वे भी अपने जीवन के प्रति आशावान और गरिमा की अनुभूति कर सकें। संकटग्रस्त व्यक्ति या जीव-जंतुओं की सेवा के लिए तत्परता दिखानी चाहिए। दान करने से हमें स्वयं के प्रति अच्छा अनुभव होता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि दान और सेवा कार्य में शामिल होने से सामाजिक विषयों के बारे में हमारी समझ बढ़ती एवं गहरी होती है। समाज के बारे में जितनी अधिक समझ होगी, उतना ज्यादा हमारा सामाजिक विकास होगा।
(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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