दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । आलस्य ही नैय्या डुबोएगा, इससे बचिए
मन की दो खराब वृत्ति है – शंका और आलस्य। इन्हीं के कारण जीवन में उन्नति नहीं हो पाती। पुरुषार्थ का विपरीत शब्द है आलस्य। आलस्य करने से विपदा घेर लेंगी। हमें अपने कामों को टालने की आदत जो पड़ी है। हमारा मन बहुत आलसी हो गया है, सुस्त हो गया है। इस आलसी मन को काम में लगाना ही पड़ेगा। कर्म की चिंगारी पैदा करके अपने मन को रौशन करना ही होगा।
दुनिया में कोई हमारा शत्रु नहीं है। हमारा केवल एक ही शत्रु है - आलस्य। यह महाशत्रु हमारे भीतर ही बैठा रहता है। यही विपदाएँ लाता है, विफलता लाता है। आलस्य ही विकास के मार्ग पर सबसे बड़ा रोड़ा है। आलस्य छोड़े बिना कोई शुभ कार्य होना संभव नहीं है। आलस्य एक प्रकार का अन्धकार है, जो मानसिक शक्तियों पर, भावी उन्नति और प्रगति को अवरुद्ध कर देता है। अत्यधिक आरामतलबी से आलस्य पैदा होता है। आलस्य ही नैय्या डुबोएगा, इससे बचिए।
लक्ष्य विहीनता से भी आलस्य पैदा होता है। कर्त्त्वयहीनता से आलस्य उत्पन्न होता है। आलस्य से व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन नीरस हो जाता है। कार्यों को करने की क्षमता होने के उपरान्त भी न करना आलस्य का प्रथम लक्षण है। आलस्य मानसिक रुग्णता का परिचायक है। दुःखी लोग आलस्य से घिर जाते हैं। दुःखों को जीवन से सर्वथा हटाया तो नहीं जा सकता, परंतु अपनी समझदारी बढ़ाकर एवं सद्गुणों का आश्रय लेकर कम अवश्य ही किया जा सकता है। अभाव और प्रतिकूलता भी जीवन में आलस्य बढ़ाने का काम करती है। कुछ भी अच्छा करने के लिए पहले आलस्य को त्यागना ही पड़ता है। आलस्य दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में उत्पन्न होता है।
मुट्ठी बांध लीजिए और उसे कुछ घंटे तक मत खोलिए। देखिएगा उसे खोलने पर दर्द होगा। हमारे मन को बहुत समय से आलस्य में पड़े रहने का अभ्यास है। आलस्य को तोड़ना पीड़ा दायक है। प्रयत्न, श्रम के बिना आलस्य को तोड़ा नहीं जाएगा। आलस्य से देह और मन, दोनों पर प्रभाव पड़ता है। हमारा आलस्य हमें बर्बाद कर रहा है। आलस्य त्यागिये और अपने को पतित होने से बचाइए।
आलस्य त्यागने के लिए सक्रिय होने की आवश्यकता रहती है। आलस्य से आगे जाने के लिए पल-पल सक्रिय होना पड़ेगा। जीवन श्रमपूर्ण है। तन एवं मन दोनों से श्रम किया जाय। इन दोनों के द्वारा जीवन प्रयासयुक्त बन जाय।
पूरे जीवन को प्रयासमय बना डालिए। जीवन में प्रयास के अलावा कुछ न बचे। इस बात को थोड़ा गहराई से समझिए। छोटे काम के लिए थोड़ा परिश्रम। बड़े काम के लिए गाढ़ा प्ररिश्रम। ऊँचे काम करने के लिए ऊँचा परिश्रम करना ही पड़ेगा। विराट जीवन के लिए विराट उद्यम करना ही होगा। घोर परिश्रमी ही बचे रहेंगे, शेष किसी दिन बाढ़ आई तो बह जाएंगे। थोड़े से श्रम करने में भी भारी वजन पैदा होता है। अपने मन को परिश्रमी बनाइए। परिश्रमी मन स्वस्थ्य रहता है, तरोताजा रहता है।
अधिक समय तक बिना किसी उद्देश्य के टेलीविजन देखना भयंकर आलस्य में घिर जाने का प्रमाण है। अधिक समय तक मनोरंजन में डूबे रहना आलस्य की ओर ही संकेत करता है। अपने को आलस्य से बचाइए। ये सब छोड़िए, कुछ नया कीजिए।
सबसे बड़ी विडम्बना है कि अपना आलस्य स्वयं मनुष्य को दिखाई नहीं देता। कोई टोकता है तो पीड़ा होती है। अपने आलस्य को पहचानने की क्षमता होना बड़ी उपलब्धि है। ज्यादा भोजन करने, पूरी नींद नहीं लेने, खराब बातों का चिंतन करने, अस्त-व्यस्त जीवनशैली, अपने को हीन समझना, खेल आदि में रुचि न लेना, अकेले बैठे रहना, निराश रहना, ज्यादा टेलीविजन देखना या क्रिकेट आदि देखना, अपने दोषों को दूसरों पर मढ़ना, पढ़ने में रुचि का अभाव, उच्च विचारों की अवहेलना करना आदि आलस्य के सूचक हैं। अपना कोई लक्ष्य साधिए।
आलस्य त्याग करने के लिए पढ़ने-लिखने में रुचि जगानी होगी। मन को संभालना होगा। जहाँ भी अच्छे कार्य होते दिख रहे हैं, वहाँ जाकर उसमें हाथ बंटाना, सहयोग करना आलस्य को दूर करने का अच्छा उपाय है। आलस्य के स्थान पर सक्रियता अपनाना जीवन में आगे बढ़ने का प्रथम सबक है। आलस्य त्याग के लिए नियमित पुस्तकालय जाना अच्छा विकल्प है। किसी भी रूप में हो सके अपने को प्रेरित करने के लिए अवसर तलाशते रहना चाहिए। ऊँचे विचारों को सुनने से आलस्य दूर होता है।
(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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Comments
I thought of writing this comment later. Then realized that I can't be lazy. Thus decided to write immediately.
Yes, blessed are the ones who work, work on time, it is these people who earn the fruit of their labour and hard work.
Arun Arora