दैनिक प्रेरणाः रुसेन कुमार । अपनी जड़ों को सींचिए




पौधे को हरा-भरा रखने के लिए उसके जड़ों को पानी की नित्य आवश्यकता रहती है। जड़ों को सींचने और खाद-पानी से तनों एवं पत्तों में हरियाली छा जाती है। जड़ें ही धरती से अनेक प्रकार के जीवन वर्धक तत्त्वों को चूस कर तनों, डालियों और पत्तों तक पहुँचाते हैं। ऊँचे पेड़ों की जड़ें अधिक गहराई में होती हैं और जमीन के भीतर भी फैली हुई होती हैं। पौधे के एक अंग दूसरे अंगों को बढ़ने में मदद करते हैं, सहारा देते हैं ताकि अधिक फैल सकें। उचित देखभाल पाने वाले पेड़-पौधों अनेक वर्षों तक जिंदा रहते हैं।

व्यक्ति एक सामाजिक पौधा है। वह छोटे से बड़ा होता है। वह विकसित होता है और समाज को अपने सुशील स्वभाव के द्वारा शीतल छाया प्रदान करता है। व्यक्ति रूपी पौधे की जड़ें कहाँ होती हैं? मनुष्य की जड़ें होती हैं उसके परिवार में। परिवार के सदस्य तनें और शाखाएँ हैं। व्यक्ति की उन्नति से परिवार की हरियाली बढ़ती हैं। परिवार रूपी जड़ को प्रेम, सहयोग, सेवा और देखभाल रूपी पोषक तत्त्व डालकर सींचा जाता है। सद्भावना परिवार की प्राण हैं। केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, जीव-जंतुएँ भी सामाजिक एवं पारिवारिक वातावरण में रहते हैं। 

विवाह करके व्यक्ति अपने लिए एक पृथक संस्था बनाता है। यह संस्था है परिवार। परिवार आधार संगठन है। परिवार को विकसित होने में थोड़ा समय अवश्य लगता है। परिवार की तरक्की इसी में है कि इसे एक संगठन के रूप में सुचारू रूप से चलाया जाय। मनुष्य की एक बड़ी आवश्यकता है – परिवार के माध्यम से सघन आत्मीयता की अनुभूति करना, अपनत्व का विस्तार करना और अंतरंग स्नेह का सामूहिक रसास्वादन करना। परिवार एक जीवंत संगठन है। परिवार निरंतर विकसित होते रहता है। परिवार को सहेजने और संवारने का भरपूर प्रयास करना चाहिए। उसे अनेक बाहरी प्रभावों से बचाए रखना आवश्यक है।

परिवार में जिन दो लोगों को विशेष देखभाल की जरूरत रहती है वे हैं – बच्चे और वयोवृद्धजन। बच्चों को बड़े होने के लिए विशेष देखभाल की आवश्यकता पड़ती है। इसी तरह ही वृद्धजनों को भी विशेष परवाह और देखभाल की आवश्यकता रहती है। इन दोनों को भावनाओं का बल चाहिए होता है। बच्चे और बुजुर्ग भावनाओं के भूखे होते हैं। बुर्जुगों के सार्थक अनुभवों के द्वारा बच्चों में नवीन संस्कार विकसित किए जा सकते हैं।  वयस्क सदस्यों का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों और माता-पिता का हरसंभव संरक्षण करें। परिवार में अपनों से व्यवहार करते समय बुद्धि, तर्क-वितर्क के बजाए हृदय और प्रेम की भाषा का उपयोग करना चाहिए।

मनुष्य को अपने घर में आराम, सुरक्षा और आत्मीय संरक्षण अनुभव होता है। परिवार के सदस्य आपस में प्रेम भाव और सहयोगात्मक रवैया रखें तो किसी भी सदस्य पर आई चुनौतियों का सहजता से मुकाबला किया जा सकता है। वार्तालाप करते समय उम्र और रिश्तों की गरिमा को बनाए रखते हुए एक-दूसरे के मान-सम्मान की रक्षा करनी चाहिए।

बच्चों को विकसित होने के लिए विशेष पारिवारिक वातावरण की आवश्यकता होती है। वयस्क सदस्यों के व्यवहार का बच्चों पर तीव्र असर होता है, क्योंकि बच्चे अनुकरण द्वारा ही सीखते हैं। बच्चों के समक्ष अभद्र व्यवहार न होने पाय, इसके प्रति सजगता अवश्य रखना चाहिए। किसी भी सदस्य के बीमार पड़ने पर शेष सदस्यों को करुणापूर्ण व्यवहार करना चाहिए। प्रेमपूर्ण व्यवहार से अस्वस्थ्य व्यक्ति पर सकारात्मक असर पड़ता है। उसे दुःखों से उबरने में दम मिलता है।

अनेक सर्वेक्षणों के निष्कर्षों में कहा गया है कि नगरीय जीवन में आधे से अधिक मानसिक तनाव का कारण उसके पारिवारिक जीवन में पर्याप्त स्नेह, सद्भाव, आत्मीयता का अभाव होना है। प्रत्येक व्यक्ति की नैसर्गिक चाहत होती है कि उससे स्नेह किया जाय, उसके साथ आत्मीयता का व्यवहार हो और उसकी गरिमा को आहत न किया जाय। इन दिनों हमारे देश में परिवार संस्था को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर जहाँ शहरों में तेजी से अति लघु परिवार का उदय हो रहा है वहीं दूसरी ओर ग्रामीण भारत में पलायन और विस्थापन के साथ-साथ यातायात और संचार के आधुनिक साधनों के दुष्प्रभाव के कारण नवयुवक-युवतियों में संयुक्त परिवारों के प्रति अनिच्छा बढ़ रही है। आइए, समाज का नवनिर्माण करने के लिए परिवार का पुनर्सृजन करें।


(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)

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