दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । इच्छा शक्ति एक प्रमुख मानवीय बल है



इच्छा शक्ति या कामना शक्ति या आत्म शक्ति दो शब्दों के योग से बना है – इच्छा (कामना) और शक्ति (बल)। इसे तीव्र इच्छा भी कहते हैं। कुछ विद्वान इसे गहरी प्यास भी संबोधित करते हैं। मन में रोजाना सैकड़ों की चीजों की इच्छा पैदा होती है। अधिकांश इच्छाएँ क्षणिक होती हैं। दूसरों को देखकर भी इच्छा पैदा होती है। मन के आधार पर मुख्य तीन प्रकार की कामनाएँ होती हैं – जानने की, मानने की और कर्म करने की। 

मनुष्य अनेक प्रकार की इच्छा करता है। अनगिनत कामनाओं को पाँच श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है। ये कामनाएँ हैं – देखने की, सुनने की, सूंघने की, स्वाद लेने की और स्पर्श करने की। मनुष्य अपनी इन्द्रियों के अधीन है। किसी वस्तु को पाने की इच्छा दो बातों पर निर्भर करती है – जरूरत एवं इंद्रिय सुख। इंद्रिय सुख प्रबल इच्छा की कामना पैदा करता है। मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति अक्सर इंद्रिय सुख को प्राथमिकता देता है जबकि बुद्धिमान व्यक्ति अपनी इच्छाओं को जरूरतों के हिसाब से प्राथमिकता के क्रम पर रखता है। 

किसी भी चीज को पाने के लिए पहले उसकी कामना पैदा करनी होती है। मनुष्य को कोई चीज तभी मिलती है जब उसकी कामना करता है या पहले से ही कामनाएँ बना चुका है। कामना का केंद्र है मन। मन ही सभी इच्छाओं का उत्पादक है। 

उत्तम, मध्यम और साधारण इन तीन गुणवत्ता के आधार पर कामना का वर्गीकरण किया जा सकता है। उत्तम कोटि की इच्छा निश्चयात्मक होती है। जैसे – मुझे उस वस्तु को पाने के लिए हर संभव प्रयास करना है। मध्य कोटि की इच्छा में दृढ़ता का अभाव होता है। जैसे – कोशिश करूँगा लेकिन नहीं मिले तो कई बात नहीं। साधारण कोटि की कामना वह है जिसके पूरा होने या न होने पर कोई प्रतिबद्धता नहीं रहती।

हमारे जीवन में इच्छा शक्ति की उपयोगिता बहुत है। इच्छा शक्ति गहन अर्थों से युक्त शब्द है। किसी भी क्षेत्र में इच्छित सफलता पाने का प्रमुख आधार इच्छा शक्ति की तीव्रता ही है। खेल में, पर्वत शिखर की दुर्गम चढ़ाई में या ऊँची शिक्षा आदि में उत्कर्ष पाने में इसी शक्ति का प्रमुख योगदान होता है। 

इच्छा शक्ति की प्रबलता के बिना सभी योग्यता, अनुकूलता एवं प्रतिभा धरे के धरे रह जाते हैं। इच्छा की मात्रा अत्यधिक होने पर वह शक्तिशाली रूप धारण करती है। चाहत का सघन होना ही इच्छा शक्ति है। किसी वस्तु को पाने की तीव्र एवं अखण्ड इच्छा का नाम ही इच्छाशक्ति है। किसी भी उत्कर्ष के आधार में प्रबल इच्छा शक्ति की सामग्री की ही अधिकता होती है। इच्छा शक्ति को प्रबल बनाने के लिए प्रबल ध्येय रखना होता है।

इच्छा शक्ति हमारे स्व और मन की संयुक्त रचनात्मक और क्रियात्मक शक्ति है, जो हमें निर्धारित कार्य को निष्कर्ष तक पहुँचाने में महान योगदान देती है। जो सही है उसे आगे गतिमान रखने की तथा जो अनुचित है उससे बचने का सामर्थ्य देती है। कुछ बातों को ध्यान में रख कर, अभ्यास करके कोई भी मनुष्य अपनी इच्छा शक्ति को प्रबल बना सकता है। यह प्रमाणिक बात है कि जीवन में सफलता इच्छा शक्ति के अनुपात में ही मिलती है। 

आत्म सुधार या व्यक्तित्व का नवनिर्माण इच्छा शक्ति पर बहुत अधिक निर्भर करता है। बौद्धिक उत्थान के साथ अपने आदर्श, लक्ष्य तक पहुँच, कार्य के प्रति निष्ठा एवं अनुराग आदि का होना वह महत्वपूर्ण तत्त्व है, जो इच्छा शक्ति को प्रखर एवं बलवान बनाता है। संगति इच्छा शक्ति को प्रभावित करती है।

वास्तव में, इच्छा शक्ति का वर्धमान, विकास और कुछ नहीं बल्कि स्वयं में अंतर्निहित शक्ति का  जागरण करना है तथा सही दिशा में उसके नियोजन करने की प्रक्रिया मात्र है। जीवन की प्रत्येक नैतिक दुर्बलता एवं पतन आदि में दुर्बल इच्छा शक्ति ही मुख्य कारण होती है। जीवन की विफलता और त्रासदी के परिणाम में दुर्बल मन की इच्छा शक्ति की ही नकारात्मक भूमिका होती है। जीने की इच्छा शक्ति रखकर रोगों को भी हराया जा सकता है। 

इच्छा शक्ति प्रमुख मानवीय बल है। इच्छा शक्ति का उपयोग सकारात्मक कार्यों में ही होना चाहिए। अनेक लोगों को आपने देखा होगा जो अक्सर ईर्ष्यावश दुश्मनी निकालने के लिए उतावले रहते हैं। चाहे कितनी भी बड़ी बात हो किसी को हानि पहुँचाने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।

 यह महान मानवीय शक्तियों को गलत दिशा में नियोजित करने का ही उपक्रम होता है। प्रत्येक मनुष्य को ऐसे परिश्रम और प्रयास करने चाहिए जिससे की उसकी इच्छा शक्ति पुष्ट हो। 

 


(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।) 


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