आज का चिंतनः रुसेन कुमार। आत्मविश्लेषण के फायदे बहुत
कोई कुछ कहता है तो हमें बुरा लगता है। कोई कुछ कहे और हमें बुरा लग जाय, ऐसा तो नहीं होना चाहिए। वह सच ही बात को तो कह रहा है। क्योंकि हममें बुराई तो अवश्य है। ऐसा क्यों है कि हममें हजार बुराइयाँ है लेकिन कोई किसी एक बुराई के बारे में जरा-सी बात कह दे तो हमारा हृदय जल उठता है। इसलिए आत्मविश्लेषण आवश्यक है। हमारे बारे में कोई कमतर कहे, उसके पहले ही हमें सावधान होकर आत्मविश्लेषण करना चाहिए।
अपने कार्यों के प्रति सजग रहें। प्राथमिकता के आधार पर अपने कार्यों को पूरा करने की कोशिश कीजिए। कोई भी कार्य तभी अच्छे से पूरा होते हैं, जब उसे एक योजना द्वारा दिल लगाकर अनुशासनपूर्वक पूरा किया जाए। कार्य करने की योजना का अभाव है, तो कार्य भी आधा-अधूरा रह जाता और ऊपर से पूर्ण लगते हुए भी भीतर से अपूर्ण रहता है। समय-समय पर अपने कार्यों, अपने विचारों, मनःस्थिति, व्यवहार, आचरण आदि का आत्मविश्लेषण अवश्य करना चाहिए। हमारे अंदर खामियाँ रहती ही हैं।
हमारे अंदर कितनी मात्रा में विकृतियाँ है उसका ज्ञान आत्मविश्लेषण करने पर ही पता चलता है। हम कितनी उन्नति कर लें सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। अपने को किसी अभिमान में रखने से आत्मविश्लेषण नहीं हो पाता। अभिमान करना कमजोरी का ही प्रदर्शन है। कोई भी व्यक्ति जन्मजात महान या खास नहीं होता है। वह महान बनता है तो अपने कार्यों से, अपने सिद्धांतों से, सद्गुणों से। हर व्यक्ति गलतियाँ करता है परंतु वह व्यक्ति जीवन की हर दौड़ में आगे निकल जाता है, जो स्वयं का आत्मविश्लेषण कर अपनी गलतियों को सुधारता है व उनकी पुनरावृत्ति न हो इसके प्रति सजग रहता है।
गैरों की बुराई करना व उसकी खामियाँ निकालना हमारे लिए बहुत सरल होता है। हममें निंदा और दोष दर्शन करने की आदत जो पड़ी रहती है। अपने भीतर को टटोलेंगे तो आप पाएँगे कि आपमें भी कई सारी बुराईयाँ व खामियाँ है, उन्हें जानने और ठीक करने की आवश्यकता है। लोग हमारे सुधार के लिए अनेक बार परामर्श देते हैं लेकिन हम उन पर गौर नहीं फरमाते।
अपने को सुधारने और परिष्करण करने से बड़ा महत्वपूर्ण कार्य व्यक्ति के पास कुछ होता नहीं है। जितनी सफाई होगी, उतनी ही ज्यादा व्यक्तित्व में चमक आएगी। जिस तरह से वस्त्र को साबुन आदि से धोने से उसकी स्वच्छता बढ़ती है।
वैसे ही आत्मविश्लेषण करने से मन की स्वच्छता बढ़ती है। उजले मन से ही किए गए कार्यों की उपयोगिता है। एक विनम्र मन ही समाज में बदलाव लाता है। स्वच्छ अंतःकरण, करुण हृदय और उदार मन इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति थोड़े या अधिक मात्रा में अपना आत्मविश्लेषण करता है। महान किताबों के आलोक में आत्मविश्लेषण करना अत्यंत प्रभावकारी होता है।
आत्मविश्लेषण अच्छा काम है। ऊँचे दर्जे का उपक्रम है। इस काम को करते रहना चाहिए। स्वयं के चश्मे से स्वयं को निहारने का नाम ही आत्मविश्लेषण। सार्वजनिक जीवन जीने वालों की अधिक आलोचना होती है। ऐसे महानुभावों के लिए आत्मविश्लेषण शीघ्र असरकारक औषधि के समान है। स्वयं के विचारों और कार्यों का मूल्यांकन करने में कुछ भी हानि नहीं, बल्कि लाभ-ही-लाभ है। हमें अपने भीतर की पुरानी दबी बातों और भावनाओं को खोज-खोज कर उसका अवलोकन करना चाहिए।
जब भी विश्लेषण करने बैठें, कॉपी और पेन लेकर ही बैठें। हमें लिख-लिखकर ही आत्मविश्लेषण करना चाहिए। आत्मविश्लेषण करने से ही अंतःकरण की ठीक ढंग से सफाई हो पाती है। हमारे अंतःकरण की मलिनता के कारण ही हमें बाहर की दुनिया धूमिल और विकृत नजर आती है। विकृति संसार में नहीं बल्कि हमारे अपने नजरिये में होती है। आत्मविश्लेषण करने का साहस कीजिए, हिम्मत जुटाइए। निःसंदेह यह कठिन काम है लेकिन इसके फायदे बहुत हैं।
(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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