दैनिक चिंतनः रुसेन कुमार । आन्तरिक वैभव बढ़ाइए
पौष्टिक भोजन बनाने के लिए आवश्यक सामग्रियाँ अवश्य चाहिए। संगीत सीखने के लिए गुरु, वाद्ययंत्र और संगीत के प्रति जिज्ञासा अवश्य चाहिए। लेखन के लिए विषय का ज्ञान और भाषा के बारे में जानकारी रखना आवश्यक है। चित्रकार के पास कैनवास का होना परम आवश्यक है। किसी घटना के लिए माध्यम की आवश्यकता रहती ही है। मन और शरीर हमारे सबसे बड़े माध्यम हैं।
हम जो भी देखते हैं, सुनते हैं, महसूस करते हैं, उन सबका संग्रहण चौबीसों घंटे हमारे शरीर और मन में होते रहता है। प्रत्येक बात का हमारे शरीर और मन के भीतर असर होता है। एक अच्छे जीवन के लिए नित नए आंतरिक वैभव का संग्रहण आवश्यक है।
लाखों प्रकार की ध्वनियाँ, गूँज, आवाजें, संगीत, चित्र, बिम्ब, महक, स्पर्श, आकृति, रूप, गंध, स्वाद, रस, अनुभव, दृश्य, यादें रोज हमारा शरीर और मन ग्रहण कर रहा है। हम कुछ भी करते हैं, देखते हैं, सुनते हैं, उनकी लाखों प्रकार की स्मृतियाँ बनती हैं। यह स्मृतियाँ हमारे भीतर जमा रहती हैं और निरंतर जमा होते रहती हैं। ये कभी न कभी हमारा काम आती हैं।
जन्म से लेकर अब तक हमने अपने मन में अरबों प्रकार की बातें संग्रहित की हैं। हमने अपने भीतर असंख्य आंतरिक वैभव संग्रहित कर रखे हैं।
मनुष्य का सृजन और उन्नतिकरण उसके आंतरिक वैभव के कारण ही होती है। मनुष्य में बुराई नामक कोई चीज है ही नहीं। जो कुछ भी है वह उसके अस्तित्व के लिए परम आवश्यक है। जैसे कि धरती में असंख्य तरह के जीव-जंतु और वनस्पतियाँ विद्यमान हैं, उसी प्रकार ही, मनुष्य के शरीर और मन में असंख्य प्रकार के जीवाणु, विषाणु, रोगाणु, भली-बुरी यादें, स्मृतियाँ उपस्थित रहती हैं। मनुष्य को जिंदा रहने के लिए असंख्य चीजों के साथ वैभवपूर्ण समन्वय स्थापित करना ही होता है।
परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत हों, मनुष्य अपने आंतरिक वैभव द्वारा ही संचालित रहता है। संकट के समय मनुष्य अपने आंतरिक वैभव का विस्तार करके ही लोगों की मदद कर पाता है। मनुष्य की यह विशेषता है कि वह अपने से ज्यादा दूसरे के जीवन को बचाने का प्रयत्न करता है। दूसरों को सुखी देखने का ही उपाय करता है। इन्हीं कारणों से, उदार हृदय और उच्च आत्मा वाले व्यक्ति अभावों में पले बढ़े होने के बावजूद किसी दिन ऊँची सफलता प्राप्त कर ही लेते हैं।
समाज में आप इसके अनेक उदाहरण देख सकते हैं। आंतरिक वैभव ही हमारे जीवन में आगे चलकर बाहरी वैभव बनके आते हैं। क्षमा, दयालुता, प्रेम, धैर्य, सद्भाव, निष्ठा, श्रद्धा, परोपकार, नम्रता, दान, निष्ठा आदि आंतरिक वैभव के विषय वस्तु हैं। मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल धन-सम्पदा अर्जित करने तक सीमित नहीं है बल्कि इससे भी कुछ बढ़कर है। धन अर्जन का इसलिए महत्व है ताकि इसका सदुपयोग किया जा सके और उसे सुख एवं संतोष देने वाले कार्यों में लगाया जा सके।
आंतरिक वैभव होने से बाह्य वैभव का महत्व बढ़ता है। केवल बाह्य वैभव होने से जीवन में लोभ, लालच, भय और असभ्यता ही पनपती है। बाह्य वैभव पाने के लिए किन विधियों का आश्रय लिया जा रहा है इसका भी मूल्यांकन करना आवश्यक है। धन का महत्व उसकी उपयोगिता पर है, न कि बहुलता पर।
आन्तरिक वैभवों के युक्त रह कर ही सच्चे अर्थों में वैभवशाली बना जा सकता है। जिनमें स्वाभाविक रूप से आंतरिक वैभव होता है, वे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ हों, अभाव में हों, विपत्ति में हों, उनसे साबुत बच निकलते हैं। वैभव की बुनियाद है सद्गुणी और सदाचारी होना। मन में सौन्दर्य भरने का प्रयास अभ्यासपूर्वक करना चाहिए।
सद्गुणी का सुखी होना निश्चित है। सदाचारी की निसंदेह ही प्रगति होगी। सदाचारी और परोपकार से युक्त मन जिनके पास भी हैं, वे धनी, सुखी और समृद्धशाली होंगे। सद्गुणों की उपलब्धता ही सबसे कारगर परिचय है। वैर, द्वेष, छल, कुटिलता आदि से आन्तरिक वैभव नष्ट होते हैं। चाहे जो भी हो मनुष्य के दुर्गुणों का दर्शन नहीं करना चाहिए।
भय, भ्रष्टाचार, लूटपाट, बदनीयति आदि की भावना रखने से वैभव घटते जाते हैं। मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा भी वैभव के रूप ही हैं। दूसरों का अहित करके स्वयं वैभवशाली बनने का विचार असभ्य और निंदनीय है। इन कृत्यों से दरिद्रता और दुर्बलता का ही प्रदर्शन होता है।
शिष्ट आचरण, ज्ञान एवं परोपकार युक्त जीवन ही वैभवशाली जीवन का आधार है। आन्तरिक वैभव संचित संपदा के समान है। आंतरिक वैभव बढ़ाइए, बाह्य वैभव स्वमेव ही बढ़ेगा।
(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।)
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फोटो स्त्रोतः https://www.flickr.com/photos/borealnz/627784315/sizes/c/




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