प्रेरक कथाः रुसेन कुमार। सज्जनता और सदाचार के जूते
अंजनेयुलु लंबी यात्रा पर गया हुआ था। उसे जीवन में आगे बढ़ने की सनक थी। वह अपने लिए एक बड़ी कामयाबी चाहता था। वह कुछ करके ही, कुछ बनकर ही लौटने निकला था।
सफर से वह आज ही लौटा है। उसके पैरों पर
घाव हैं। तलवे में चोट के निशान हैं और कई जगह तो अभी भी काँटे चुभे हुए हैं।
"दुनिया बड़ी खराब है। इसमें हर कदम पर काँटे बिखरे हुए हैं।" – अंजनेयुलु ने गुरु सोमायाजुलु से शिकायत भरे अंदाज में सफर की परेशानियों का निष्कर्ष देते हुए कहा।
"पुत्र ! तुमने ठीक ही कहा। दुनिया
में हर जगह काँटे बिखरे हुए हैं। यह तुम्हारी जिम्मेवारी है कि तुम काँटों से बचकर
चलो।" – गुरु सोमायाजुलु ने शिष्य अंजनेयुलु
को समझाया।
"इतने उत्साहित थे कि तुम जूता
पहनना भी भूल गए थे।" – गुरु सोमायाजुलु ने कहना
जारी रखा।
"आगे बढ़ना है तो तुम्हें खुद को
घायल होने से बचाना होगा। दुनिया के काँटे बीनने में बुराई नहीं लेकिन कठिन
है।" – गुरु ने कहा।
"सुनो पुत्र ! तुम्हारा अच्छा
स्वभाव ही तुम्हें घायल होने से बचाएगा। परदेश में अच्छा स्वभाव और सदाचार ही
बुराइयों और चोट खाने से बचाए रखते हैं। परदेश में सहायता के लिए माता-पिता,
पुत्र, पुत्री, पत्नी,
भाई, हितैषी नहीं पहुँच सकते। वहाँ तो
तुम्हारे अपने अच्छे स्वभाव और अच्छे आचरण ही तुम्हारी सहायता करेंगे।" – गुरु सोमायाजुलु ने अपनी बात पूरी की।
गुरु सोमायाजुलु ने प्रेम भरे स्वर में शिष्य अंजनेयुलु को आदेशित किया – "अगली बार सफर पर निकलो तो सज्जनता और सदाचार के जूते अवश्य पहन लेना।"
(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके
समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ
आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in
पर संदेश लिखिए।)
सुधि पाठकों से निवेदन है कि रचना अच्छी लगने पर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया अवश्य लिखिए।
फोटोः https://www.flickr.com/photos/afsunehn/50697088107/sizes/z/




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