कविताः रुसेन कुमार । स्वर्णिम निशा

 



ये रात भी चली जाएगी

जैसे कल की रात चली गई थी


किया क्या मैंने

केवल खर्राटे भरने के


कुछ न किया

सिवाय करवटें बदलने के


कुछ न किया

सिवाय झूठे सपनें देखने के


किसी ने कहा

आह !

कितनी चमक थी कल चाँद की


पर देख न सका

वह अनुपम सौन्दर्य

चाँद पर परदा नहीं था

परदा मेरी आँख पर था


कितना अभागा था मैं


बिता दी एक और रात

खो दी एक और स्वर्णिम निशा


क्या हर रात सोना जरूरी है?


जिस तरह सोते-सोते गुजर जाती है

अक्सर रात मेरी


वैसे ही

क्या पढ़ते-पढ़ते गुजर नहीं सकती थी

वह रात?


तो क्यों न आज की रात को

कुछ सीखते-सीखते संवार दूँ!


क्यों न अब रातें जागकर ही गुजारी जायें!




(रुसेन कुमार अग्रणी पत्रकार एवं लेखक हैं। उनके समसामयिक लेख, चिंतन, रचनाएँ आदि नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहती हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं एवं वेबमाध्यमों में प्रकाशन की अनुमति के लिए rusenk@indiacsr.in पर संदेश लिखिए।) 

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